Wednesday, June 23, 2010
कभी खुद कविता का विषय
कितना विचित्र है मन
खुद ही बुनता है परेशानियाँ
झेलता है दुख और त्रास
रहता है बेचैन
और देर-देर तक उदास
और फिर
खुद ही
आशा की किरण
खोज निकालता है
देता है दिलासा
भरता है उत्साह
जाँबाजी और जिंदादिली
कभी कविता लिखवाता है
कभी खुद कविता का विषय बन जाता है
Monday, June 21, 2010
मेटामार्फि़स्म
ज्यादा अंतर्मुखी
ज्यादा बेचैन
ज्यादा परेशान
कुछ-कुछ चिढ़चिढ़ा
क्या तुम सोच सकती हो
तुम्हारे सामने
अल्हड़,पागल, दीवाना औऱ हँसमुख
रहने वाला मैं
ऐसा भी हो रहा हूँ
Sunday, June 20, 2010
Saturday, June 19, 2010
Thursday, June 17, 2010
मैंने घर को जंगल बना रखा है !
इधर या उधर आगे या पीछे
नीचे और उपर(!) जिधर से शुरू करूँ
पेड़ ही पेड़ हैं
(झाड़ियों को भी यही समझता हूँ मैं
जैसे ब्लॉग और माइक्रो ब्लॉग एक ही समझे जाते हैं)
बाँस, पीले फूलों वाला केल
कटहल, गूलर, गुच्छों और विरल फूलों वाला लाल कनेर
अशोक, बोगनबेलिया लाल, गुलाबी, पीला, सफेद
नीम कड़वा और मीठा
नींबू कागजी और बिजौरा, बेर
आम कलमी और देसी, पपीता
लिली सफेद, गुलाबी और लाल फुटबॉली
कोयल/नीलकंठ, चंपा लाल और पीला
गोल्डन ग्रीन हैज, सीताफल, बदाम
जामफल, गुलमोहर, अमलतास, संतरा
लेमनग्रास, गुलटर्रा, चमेली, जूही
जामुन, रबर, क्रिसमस फ्लॉवर, मोगरा
क्रिसमस ट्री, पारिजात जंगली, गुलाब देसी, पीले, लाल, सफेद
पीपल, बरगद, सागौन, आँवला, गोल्डन शॉवर, तुलसी, मनीप्लांट
कैक्टस, लतरें, फर्न, दवा बिच्छु की, जरकंडा, अडेनियम, ज़ेड
कुछ बिन उगाए ही, उग गए हैं, जंगली फूल और पौधे....
मैं अपने घर के चारों ओर जंगल लगा रखा है
तुम कहते / कह सकते हो, मैंने घर को जंगल बना रखा है
Wednesday, June 16, 2010
मैंने तो बस पेड़ लगा रखे हैं
मौसम चितरता रहता है ,मैंने तो बस पेड़ लगा रखे हैं
लोग कहते हैं घर के चारों ओर, कैनवास सजा रखे हैंरंग, रूप, आकृति, गंध और छाया क्या नहीं
कुदरत ने मेरे घर के चारों ओर,जादू बिछा रखे हैं
ठंड में कुनकुना और भर गर्मी में शीतल है मेरा घर
भरम है तुमको, मैंने एसी और कूलर्स लगा रखे हैं
Monday, June 14, 2010
मैं तो मायूस लौटा हूँ
जरूरी नहीं कि चीजें सुलझती है अक्ल के हवाले से
मैंने तो अक्सर सुलझते देखा है इन्हें हीले-हवाले से
गर तेज हो हवा तो गुल हो जाती है शमा
कुछ दिए जब भी जलते रहते हैं तूफान में मतवाले से
मौत अजीब शै है, दूर कर देती है शक्लो सूरत
याद कहाँ छीन पाता है कोई माशूक की दिलवाले से
तुम्हें मिला होगा ख़ुदा, मुबारक़ हो, गर मिला
मैं तो मायूस लौटा हूँ, हर दीनो-हरम, मस्जिद-ओ-शिवाले से
वो मेरी गोद, मेरे कांधे पे रोकर हल्के हुए
मैं अपने छालों को सहलाऊँ, किस रिसाले से
Sunday, June 13, 2010
वह अनजानी जगह
दूर बॉटल बुरूस
शीशम, अमलतास और गुलमोहर
निगाहें लौट आती हैं
इनकी खुशबू
और आकर्षण से
सराबोर होकर
शीशम, अमलतास और गुलमोहर
निगाहें लौट आती हैं
इनकी खुशबू
और आकर्षण से
सराबोर होकर
मैं
यहाँ दूर बैठा हूँ
क्या सचमुच
हाँ भी, नहीं भी
तो फिर?
अनजानी
अनपहचानी
धुँधलाई-सी एक
गुफा-सी में
अरे! यह तो मन है किसी का
किसका?
खोज रहा हूँ, उसी को
अथक, अनवरत ........
Saturday, June 12, 2010
संतति का सच
वह तेज हवा थी
तोड़ गई
आखिरी पत्ता दरख़्त का
शाख ने कहा
-अस्फुट से- झुँझलाए स्वर में
यह क्यों
मुझसे क्या बैर तेरा
धीरे से मुस्काई हवा
कहा सुरीले स्वर में
सुन, इसलिए कि
कोंपले फूटे दोबारा
बहारें आए फिर से
तुझे मोह छो़ड़ना ही होगा
जीवन मोह से शुरू होता है
मोह-भंग पर अंत (तो बहारें, कोंपलें, मौसम?)
अरी पागल !
पुनर्जन्म, मोह की संतति
तोड़ गई
आखिरी पत्ता दरख़्त का
शाख ने कहा
-अस्फुट से- झुँझलाए स्वर में
यह क्यों
मुझसे क्या बैर तेरा
धीरे से मुस्काई हवा
कहा सुरीले स्वर में
सुन, इसलिए कि
कोंपले फूटे दोबारा
बहारें आए फिर से
तुझे मोह छो़ड़ना ही होगा
जीवन मोह से शुरू होता है
मोह-भंग पर अंत (तो बहारें, कोंपलें, मौसम?)
अरी पागल !
पुनर्जन्म, मोह की संतति
Friday, June 11, 2010
स्वाति बूँद
पीयूषवर्णी मेघ ने
द्रवित हो
एक बूँद टपकाई सहसा
कदली, सीप और भुजंग ने
तुरंत अपना
मुँह खोला
लेकिन
बूँद की कोई और मर्जी
वह गिरी
साँवली गोरी के
उत्तुंग वक्ष पर-
गोरी सिहर कर लरज गई,
गंध कपूर की
मोती की शुभ्रता
और जहर-सी तीव्रता, तीक्ष्णता
उस बूँद ने पाई
और हो गई सार्थक.....
विधाता की माया अजब.....
स्वाति नक्षत्र हुआ कृतार्थ।
द्रवित हो
एक बूँद टपकाई सहसा
कदली, सीप और भुजंग ने
तुरंत अपना
मुँह खोला
लेकिन
बूँद की कोई और मर्जी
वह गिरी
साँवली गोरी के
उत्तुंग वक्ष पर-
गोरी सिहर कर लरज गई,
गंध कपूर की
मोती की शुभ्रता
और जहर-सी तीव्रता, तीक्ष्णता
उस बूँद ने पाई
और हो गई सार्थक.....
विधाता की माया अजब.....
स्वाति नक्षत्र हुआ कृतार्थ।
Thursday, June 10, 2010
चिरमिलन हो चिरंतन
अधरों से अधर
धड़कता वक्ष सीने से
कपोल कपोलों से
मिले,.....।
भर गई नासापुटों में,
साँसों की गरमाई,
आँखों से लाज के
हरसिंगार झरे....।
कान तक कपोल
हो गए रतनार.....।
श्यामवर्णी केशों में
घूमती
ऊँगलियों ने
स्वाद जाना
प्यार का....।
शरबती आँखों से
छलक गई
ढेर सारी शराब
तृप्त होकर अंतस से
आई आवाज
चिरमिलन हो चिरंतन
या कि आखिरी साँस हो
Wednesday, June 9, 2010
एक सीमाहीन वृत्त
एक धुँधले से आलोक में
मैंने चाहा
उसे घेर लूँ
एक वृत्त बनकर
मैंने यत्न किया
कभी चित्रकार
कभी मूर्तिकार
कभी कवि बना
मेरे सब प्रयास
निष्फल हुए
और स्वप्न के एक
जागरण में
मैंने देखा
वह मुझे घेरे हुए है
क्योंकि
वह स्वयं
एक सीमाहीन वृत्त था
Tuesday, June 8, 2010
गम में लिखे मैंने गीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
पा जगत का प्यार एक दिन
मन था फूला न समाया
मैं मदमाता फिर रहा था
तू अचानक पास आया
छूने को बढ़े जब हाथ मेरे
तू तोड़ चला मेरी भावुक प्रीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
मधु- मौसम था मन में छाया
कोयल की कूक से मन भरमाया
मैं पुष्प-सा खिल रहा था
तू भँवरे -सा पास आया
सोचा साथी तुझे बनाऊँगा
तू मिटाकर तृष्णा अपनी
राह गया विपरीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
सुर-छंद-ताल सब सजे
था वाद्य मन- वीणा का बजा
तेरे आने की खुशी में
मैंने थी महफिल सजाई
राग-बेराग हो गया सब
जब छोड़ चला मझधार में
सभा और संगीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
गम में लिखे मैंने गीत
पा जगत का प्यार एक दिन
मन था फूला न समाया
मैं मदमाता फिर रहा था
तू अचानक पास आया
छूने को बढ़े जब हाथ मेरे
तू तोड़ चला मेरी भावुक प्रीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
मधु- मौसम था मन में छाया
कोयल की कूक से मन भरमाया
मैं पुष्प-सा खिल रहा था
तू भँवरे -सा पास आया
सोचा साथी तुझे बनाऊँगा
तू मिटाकर तृष्णा अपनी
राह गया विपरीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
सुर-छंद-ताल सब सजे
था वाद्य मन- वीणा का बजा
तेरे आने की खुशी में
मैंने थी महफिल सजाई
राग-बेराग हो गया सब
जब छोड़ चला मझधार में
सभा और संगीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
Monday, June 7, 2010
तुमको रास मौन की भाषा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
चाहे सदा ये मन मेरा
सजा कर स्वर की रंगोली
युगल स्वर में लगाए
नेह के गीतों की बोली
मैं ललक कर जब पास आता
मौन के समक्ष दब जाती पिपासा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
इंद्रधनुष से ढेर सारे रंगों को मैं चुरा लूँ
लेकर तेरा दामन, चोरी से
गगन-सा उसको सजा दूँ
रूक जाते बढ़ते हाथ मेरे
देख तेरी नीरस प्रत्याशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
पास आकर मैं जो तेरे
हाथ से कुछ चाहता हूँ
तू इशारों से उस तक
पहुँचा देती है मुझे
मैं चाहता स्पर्श तेरा
हरदम मिलता मुझे निराशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
Sunday, June 6, 2010
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों ?
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
जीवन पथ की इन राहों में
हैं कितने कंटक और प्रस्तर
घिसट-घिसट अपनी देह को
अनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
है अंतरमन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित लिए
जीवन के इस रंगमंच पर
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
महत्वाकांक्षा को समेटे
दिवास्वप्नों को सहेजे
हृदय और आँखों में अनगिनत
आशा सजा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
जीवन पथ की इन राहों में
हैं कितने कंटक और प्रस्तर
घिसट-घिसट अपनी देह को
अनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
है अंतरमन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित लिए
जीवन के इस रंगमंच पर
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
महत्वाकांक्षा को समेटे
दिवास्वप्नों को सहेजे
हृदय और आँखों में अनगिनत
आशा सजा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
Saturday, June 5, 2010
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
अपने से ही बात करूँ
अपने सुख-दुख का हाल कहूँ
अपने घावों को खुद सहलाऊँ
खुद अपनी पीड़ा को गाऊँ
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
सत्य के क्षितिज पर पहुँच कर
अंतिम सत्य शून्य ही पाता
यह नहीं अंतिम सत्य
क्यों बार-बार मैं दोहराता
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
एकाकी है मेरा तन-मन
मंजिल मेरी एकाकी
दो पल साथ मिला किसी का
बाकी जीवन एकाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
कितनी दूरी तय कर ली
कितना त्रास भोग चुका
नहीं मील का पत्थर पथ में
समझूँ कितना चलना है बाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
Friday, June 4, 2010
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
तू मेरे गीतों को पढ़, मेरी
भावुकता पर तरस खाए
और स्वयं की जीत पर
मंद-मंद मुस्कुराए
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
मैं अपनी भावुकता को तज
अपनी राह बनाऊँगा
जो तेरे दर तक पहुँचाए
उस राह कभी ना आऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
कभी था चाहा तुझे बहुत
अब पाने को अरमान नहीं
पास मेरे भी हैं प्रतीक्षित
तू ही एक पैगाम नहीं
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
याद करके मेरा प्रणय
नयन एक होंगे एक दिन सजल
दूर बहुत दूर लेकिन तब
तलक मैं चला जाऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
Sunday, May 30, 2010
बरखा गीत
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
मेघमय आकाश सारा
आच्छन्न है हरीतिमा पर
हौले से आकर गालों पर
टकराती है बूँद कोई
तनमन सिहर सा जाता
मन कहता है स्वयं से
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
रोम-रोम पुलक उठता
मात्र जिसके स्मरण से
बह चली है मधुर गति से
अल्हड़-सी वो पुरवाई
वो जो मुझसे दूर कहीं है
रे तू सहेली है न उसकी
जा जरा उसको जगा दे
रूठ कर जो है सोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
बूँद बनकर बरस
रिमझिम-रिमझिम नृत्य कर
मैं चातक-सी तृष्णा लिए
जोहता हूँ बाट तेरी
पावस की इस ऋतु में
हम-तुम हो जाए समरस
मैं मस्त मतवाला बन जाऊँ
तुम रख लो साक़ी वेश कोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
Friday, May 28, 2010
सुंदरता को अपूर्ण ही होना चाहिए
रिमझिम झरती बूँदों को
बेधकर जब निकली
रवि-रश्मि
तो नीले आकाश पर
तन गया
इकहरा इंद्रधनु
रे धनु
तू भी है अभागा
सचमुच मेरी तरह
जो सुंदर है किंतु
संपूर्ण नहीं
अपूर्ण है
क्योंकि तीर नहीं
सुंदर है
क्योंकि तीर नहीं
तीर का होना
संधान का होना है
और संधान
नष्ट करता है
मिटाता है, गिराता है
ध्वंस करता है
लगा सचमुच सुंदरता को
अपूर्ण ही होना चाहिए
Thursday, May 27, 2010
ताकि तराश सकूँ....
लिखता रहा
ताकि मर ना जाए
उन क्षणों की अनुभूतियाँ
जिन्हें मैंने जिया
जिंदा रहे वह मधुरस
और हलाहल
अपनी खुशी से
वक्त के हाथों
जिसे मैंने पिया
लिखता रहा
ताकि बने रहे
उन ज़ख़्मों के निशां
जिन्हें अपने ही हाथों
अकेले में मैंने सिया
लिखता रहा
ताकि फूटती रहे कोंपलें
[दर्द के दरख़्त से
जिस्म और रूह में
अपने ही हाथों
जिसे मैंने बोया
लिखता रहा
ताकि तराश सकूँ
अपने ही बुत को
मेरे ख़्वाबों ने
मेरी आँखों में
जिसे हर रात संजोया
लिखता रहा.....लिखता रहा....
Wednesday, May 26, 2010
पुरवाई बहार की !
घूँट-- दर घूँट पीकर दर्द तेरे इंतजार का
रफ्ता-रफ्ता देख यूँ ही उम्र गुज़ार दी
खुद की हार का ग़म, या तेरी जीत की खुशी
हर शाम जिंदगी की मगर, यूँ ही निसार की
कोई आकर पूछेगा तो इतना ही कहेंगे नीरव
अबके ये बाज़ी बिना खेले ही हार दी
कोई एक ज़ख्म हो तो बताए दिल पर
नश्तर को भी अब तो, मिलती है लाचारगी
कोई सहेगा क्या हम- सा दर्द ए दोस्त
टूटे जब भी ऐसे हँसे गोया खुशी इज़हार की
वो तेज झोंके -सा आकर तोड़ गया, आखिरी पत्ता
दरख़्त का, हम ये समझे कि चली पुरवाई बहार की
Tuesday, May 25, 2010
कितनी क्षुद्र लेखनी मेरी
गिनती के गीत जुटा पाया
अपनी आँहों को उर में भर
तप कर, जलकर जीवन भर
संसृति सागर से गगरी में
दो-चार बूँद ही भर पाया
गिनती के गीत जुटा पाया
अलबेली मंजिल के दुष्कर पथ पर
कुछ फूल खिले कुछ काँटे थे
इनकी ही गंध चुभन को
अपनी साँसों में भर लाया
गिनती के गीत सुना पाया
मनचाहा यदि लगे तुम्हें कुछ
बिन पूछे ही ले जाओ
होगा कृतार्थ जीवन मेरा
किंचित भी यदि दे पाया
गिनती के गीत सुना पाया
इन्हें पढ़कर जी भर हँसना
मेरी भावुकता और नादानी पर
कितनी क्षुद्र थी लेखनी मेरी
सार की बात न कह पाया
गिनती के गीत सुना पाया।
Monday, May 24, 2010
कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
झूठे वादे करूँ कब तक
कब तक प्यार की कसमें खाऊँ
रस्में दकियानूसी निभाऊँ कब तक
कब तक झूठी बात करूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
जानता हूँ तू नहीं महबूबा मेरी
छोड़ कर साथ एक दिन जाएगी
तो फिर आज ही क्यों न कहूँ
लिव मी अलोन, क्यों बोझ सहूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
क्यों भला तुझको हँसा कर मैं दर्दों गम उठाऊँ
रूठ जाए तो तुझे मनाऊँ
क्यों नाज़ो-नखरे उठाऊँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
देख दूर से वो सौत तेरी
मुझे करीब बुला रही है
ढूँढ ले अब तू भी साथी
अलविदा मैं तो चलूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
Sunday, May 23, 2010
विलंबित खुशियाँ
क्या इनको लेकर करूँगा,
असमय जो तूने दी सौगातें
क्या इनको लेकर करूँगा।।
जब इनकी कुछ चाह मुझे थी.
जब इनकी परवाह मुझे थी,
उस समय तूने की बेपरवाही अब
क्या इनको लेकर करूँगा।।
खुशियों को गम में बदलकर,
ग़म को भी भोगा तनहा,
अब यदि नीरव नीर बहाएँ,
क्या इनको लेकर करूँगा।।
मेरे नेह का कोमल पौधा,
मुरझाकर जब सूख गया।
अब यदि मधुऋतु आए,
क्या इसको लेकर करूँगा।।
मेरे भावमय छंद सुन,
तू हरदम मुझ पर हँसा,
मैं मरणशय्या पर, तू इनको गाएँ,
क्या सुनकर इनको करूँगा।।
ना अब दे तू मुझे कुछ,
मैं कुछ ना ले सकूँगा,
तनहा, तगं हाथ रखा ताजिंदगी,
अब भी तनहा खाली हाथ ही मरूँगा।।
Saturday, May 22, 2010
छोड़ दी मैंने तल्खियाँ
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
कितना पहरे बैठाए थे तूने
खुद पर खुद की आरजुओं पर
ये गज़ब कैसे हुआ मगर
तुझ पर तेरा ही न बस चल पाया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
उसके आने की न मुझको खबर हुई
न सुराग, न आहट, न अहसास
मेरे पास आकर जब तक ये न बतलाया
तू जिसके ख़्वाबों में गुम, मैं उसी का साया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
और जब वो मेरा मेहमाँ हुआ
छोड़ दी मैंने तल्खियाँ, पुरानी रंजिश
पहले उसके साथ एक जाम पिया, फिर
फिर से नग़मा भूले प्यार का गाया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
Friday, May 21, 2010
कोई कैसे कहेगा, जिंदा है अब हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
अब न उदास धड़कनें हैं न प्यास है
न तुम, न तुम्हारी याद, न खुशी, न ग़मन
मचलते अरमाँ है, न बदहवासी का आलम
अब तो हमारी तनहाई है और है हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न शरबती लब है, न मय छलकाती आँखें
न लहराते गेसू हैं, न खोजती किसी को नज़र
न तुम, न तुम्हारी खुशबू न साँसें है गर्म
अब तो हमारी रूसवाई हैं और हैं हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न उमंग है, न मस्ती, न ज़ुंबिश कहीं
न उदासी, खालीपन नहीं, बेचैनी भी नहीं
अजब सा वीराना है, अजब-सा है मौसम
अब तो अजनबी पन है और हैं हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न रानाईयाँ है तेरे हुस्न की, न नशा
न तेरे जमाल की मदमाती अँगड़ाई है
न रूप की तपती धूप है, न गेसूओं की छाँव नरम
अब तो बेहया जिंदगी है, और हैं हम
Thursday, May 20, 2010
न गेसूओं को तुम हटाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
महकने दो साँसों में शबाब
खिलने दो गालों में गुलाब
छलकने दो आँखों से मधु
होंठो से बरसने दो शराब
यूँ ही छाई रहने दो ख़ुमारी
मदहोश हूँ न होश में मुझको लाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
टिका रहने दो सर अपनी गोद में
शानों पर रेशमी ज़ुल्फें लहराने दो
मुझको मालूम है हक़ीक़त ख़्वाबों की मगर
यह ख़्वाब जिंदगी भर का हो जाने दो
ख़ामोशी से देखती रहो मुझको बस
हो सके तो मेरी आँखों में बस जाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
Wednesday, May 19, 2010
.....और गज़ल कहे कोई
दिल गमों से चूर हो
और गज़ल कहे कोई
दर्द को छिपा ले कलेजे में
और गज़ल कहे कोई
सौ तल्खियाँ हो चेहरे पे
और गज़ल कहे कोई
ख़लिश न मिटती हो दिल की
और गज़ल कहे कोई
लरज़ते ज़ख्म हो दिल के
और गज़ल कहे कोई
टूटते लफ़्ज हो जुबाँ पर
और गज़ल कहे कोई
बहुत कहने को हो अरमाँ
और गज़ल कहे कोई
आखिरी लम्हा हो जिंदगी का
और गज़ल कहे कोई
वसीयत में लिख जाए गज़ल
और गज़ल कहे कोई
और गज़ल कहे कोई
दर्द को छिपा ले कलेजे में
और गज़ल कहे कोई
सौ तल्खियाँ हो चेहरे पे
और गज़ल कहे कोई
ख़लिश न मिटती हो दिल की
और गज़ल कहे कोई
लरज़ते ज़ख्म हो दिल के
और गज़ल कहे कोई
टूटते लफ़्ज हो जुबाँ पर
और गज़ल कहे कोई
बहुत कहने को हो अरमाँ
और गज़ल कहे कोई
आखिरी लम्हा हो जिंदगी का
और गज़ल कहे कोई
वसीयत में लिख जाए गज़ल
और गज़ल कहे कोई
Sunday, May 16, 2010
मुझसे सहा जाता नहीं...
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
अंर्तमन में है पीड़ा सभी को
बिन पीड़ा जीवन कोई पाता नहीं
कैसे कहूँ, डाल लो आदत सहने की
आशावादी यह कह पाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
माना तुम्हारी परिभाषा से
यह दुख है सुख का साधन
एक बात तुम भी मानो
यह साधन साध्य तक पहुँचाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
कैसे कहूँ तुम्हारा कल्पना दर्शन
कहीं-न-कहीं दोषयुक्त सखे
स्वयं मेरा अनुभव दर्शन भी तो
मुझको छिद्रांवेषण सिखलाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
प्रकृति के नियमों पर चलो
रोने से पहले जी भर हँस लो
नियति को जो मंजूर वह जाने
कर्म से विमुख भी तो रहा जाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
Saturday, May 15, 2010
तब हुई कोई कविता
विरही के यादों के मौसम में
रिमझिम बरसते सावन में
दो बूँद मिली हो अश्रु की
ऐसा संगम जब-जब हुआ
तब हुई कोई कविता
हिरण-से इस चंचल मन ने
स्मृति वन में दौड़ लगाई
कहीं ठहर दो लम्हे काटे
ऐसी जब कोई ठौर मिली
तब हुई कोई कविता
तनहाई के सूने क्षण में
बेचैन के दर्द भरे आलम में
पायल की झंकार बजी कोई
वंशी कहीं मधुर सुनी कोई
तब हुई कोई कविता
भीड़ भरे इस जंगल में
बेगाना हर शख्स मिला
सुकुन कितना मिला नीरव
जब कोई अपना-सा मिला
तब हुई कोई कविता
कल्पना ने जब ख्वाब बुना
कवि के खयालों में लिपट कर
ऐसा अद्भुत मिलन हुआ
खुशी रोई दर्द से लिपटकर
तब हुई कोई कविता
रिमझिम बरसते सावन में
दो बूँद मिली हो अश्रु की
ऐसा संगम जब-जब हुआ
तब हुई कोई कविता
हिरण-से इस चंचल मन ने
स्मृति वन में दौड़ लगाई
कहीं ठहर दो लम्हे काटे
ऐसी जब कोई ठौर मिली
तब हुई कोई कविता
तनहाई के सूने क्षण में
बेचैन के दर्द भरे आलम में
पायल की झंकार बजी कोई
वंशी कहीं मधुर सुनी कोई
तब हुई कोई कविता
भीड़ भरे इस जंगल में
बेगाना हर शख्स मिला
सुकुन कितना मिला नीरव
जब कोई अपना-सा मिला
तब हुई कोई कविता
कल्पना ने जब ख्वाब बुना
कवि के खयालों में लिपट कर
ऐसा अद्भुत मिलन हुआ
खुशी रोई दर्द से लिपटकर
तब हुई कोई कविता
मैं दागदार चाँद हूँ गगन का
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
इस तरह से प्रणय हुआ संभव कहीं है
संस्कार मुझसे छूटने वाले नही
और तू नहीं लाज तजना चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
इस तरह आराधन भी अच्छा नहीं है
मैं निरा-निपट पाषाण और
तू देव मूरत गढ़ना चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
चकोर-सी यह अभिलाषा सच्ची नहीं है
मैं दागदार चाँद हूँ गगन का और
तू निर्मल चाँदनी का स्नान चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
अपराधी पर इतना विश्वास भी अच्छा नहीं है
मैं गुनाहों का देवता ठहरा और
तू मुझसे पुण्य कर्म चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
Friday, May 14, 2010
भूल गया हूँ, तब से खुदा को
रोको चाहे मुझको जीने से
मत रोको यारों पीने से
गम बढ़ता है जीने से
खलिश मिटती है पीने से
पीकर एक लम्हा जीना है अच्छा
बिन पिए बरसों जीने से
कैसे रिंद हो जो डरते हो
नशीली नजरों से पीने से
काफिर मुझको कहते हैं, लोग
बंदगी मेरी, तेरे हाथों पीने से
भूल गया हूँ, तब से खुदा को
लगा जबसे हूँ तेरे सीने से
रोको चाहे मुझको जीने से
मत रोको यारों पीने से
Thursday, May 13, 2010
तब तलक गम को सहेजूँ
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
जार-जार रोता है दिल
रक्तिम है हर कोना
कोई मरहम, मैं पाऊँगा
मुश्किल लगता ऐसा होना
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
तज इसे सकता नहीं मैं
साथ निभ सकता नहीं
मजबूर है हालात इतने
खुल कर रो भी सकता नहीं
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
काश ऐसा हो सके कि
फैल जाए दामन मेरा
फिर जी भर समेटू
बचा जो दर्दों गम तेरा
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
चल रहा हूँ यह सोचकर
वह मुकद्दस वक्त आए
दूर कहीं किसी क्षितिज पर
मिलन तुझसे हो ही जाए
दर्द को समेटू वहाँ तक
तब तलक गम को सहेजूँ
Monday, May 10, 2010
मधु ऋतु
दूर कहीं कोयल बोली
वीरान पड़ा था कब से गुलशन
तितली, भँवरे, माली थे चुप
तनहा-तनहा लगता मौसम
ऐसे में यह मधुबोली
दूर कहीं कोयल बोली
कलियाँ मुस्काएँगी अब
बहारें आएँगी गुलशन में
भँवरे फूलों पर मँडराएँगें
होगी फूलों संग आँख-मिचौली
दूर कहीं कोयल बोली
खुशनुमा होगा हर लम्हा
मधु ऋतु होगी बगियन में
खुशबू से सराबोर होंगी साँसें
रंगों की सजेगी रंगोली
दूर कहीं कोयल बोली
फूलों के संग होगी बातें
कलियों संग कटेगी रातें
स्मित होगी हर अधर पर
नयनों में होगी नीरव बोली
दूर कहीं कोयल बोली
मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मादकता भूला साकी नयनों की
मधु की मदहोशी भूला
प्यालों की खनक पायल झंकार
मधुबाला की डपट-दुलार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
कंचन देह की द्य़ुति भूला
साँसों में महकता कचनार भूला
चपलता भूला मृग नयनों की
ओंठो से हुआ अभिसार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
याद उसे कब कर पाऊँगा
याद उसे कब आऊँगा
दूर बैठा कहीं, मीत मन का
मैं उसे, शायद वह भी है मुझको भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मादकता भूला साकी नयनों की
मधु की मदहोशी भूला
प्यालों की खनक पायल झंकार
मधुबाला की डपट-दुलार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
कंचन देह की द्य़ुति भूला
साँसों में महकता कचनार भूला
चपलता भूला मृग नयनों की
ओंठो से हुआ अभिसार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
याद उसे कब कर पाऊँगा
याद उसे कब आऊँगा
दूर बैठा कहीं, मीत मन का
मैं उसे, शायद वह भी है मुझको भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
Friday, April 30, 2010
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कब तक रचूँ शब्द देह
कब तक कल्पित अभिसार करूँ
कब तक रचूँ मूर्ति कल्पना की
कब तक रचूँ कंचन कामिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी सुहानी रात है यह
कैसी धवल है चाँदनी
मन वीणा के तार कह रहे
छेड़े कोई आकर रति रागिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
प्रीत का कोई गीत गाए
संग प्रिया के मन भी गाए
खोजती है जिनको निगाहें
आ जाओ मधुबन की मालिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी मिलन की यामिनी
कब तक रचूँ शब्द देह
कब तक कल्पित अभिसार करूँ
कब तक रचूँ मूर्ति कल्पना की
कब तक रचूँ कंचन कामिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी सुहानी रात है यह
कैसी धवल है चाँदनी
मन वीणा के तार कह रहे
छेड़े कोई आकर रति रागिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
प्रीत का कोई गीत गाए
संग प्रिया के मन भी गाए
खोजती है जिनको निगाहें
आ जाओ मधुबन की मालिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
Wednesday, April 28, 2010
कली चटकी कहीं, फूल खिला कोई
कली चटकी कहीं, फूल खिला कोई
मन उपवन था उजड़ा-सा
पतझड़ था युगों से आँगन में
आई बसंत बहार
लाया उसे बुला कोई
कूक कोयल की, भँवरे का गुँजन
तड़प रहा था, कबसे सुनने को मन
मन मुराद पूरी हुई, शुभ घड़ी आया कोई
गुलाब खिला, मोगरा महका
संदल चहका, मन खुश्बू से बहका
मन जैसे सोना हुआ
उस पर सुहागा लाया कोई
मन को जैसे पंख लगे
उड़कर आया पास तेरे
पीकर जिसको बहका नीरव
ऐसी मधु लाया कोई
कली चटकी कहीं फूल खिला कोई
मन उपवन था उजड़ा-सा
पतझड़ था युगों से आँगन में
आई बसंत बहार
लाया उसे बुला कोई
कूक कोयल की, भँवरे का गुँजन
तड़प रहा था, कबसे सुनने को मन
मन मुराद पूरी हुई, शुभ घड़ी आया कोई
गुलाब खिला, मोगरा महका
संदल चहका, मन खुश्बू से बहका
मन जैसे सोना हुआ
उस पर सुहागा लाया कोई
मन को जैसे पंख लगे
उड़कर आया पास तेरे
पीकर जिसको बहका नीरव
ऐसी मधु लाया कोई
कली चटकी कहीं फूल खिला कोई
Saturday, April 24, 2010
पशु का तन जीता
असमंजस में ही वक्त गँवाया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
मन की कल्पना शक्ति ने
जब भी कोई ख्बाव बुना
उलझनों से टकरा कर हरदम
उसने अपना सिर धुना
कवि के भावुक मन से हाय
पशु का तन जीता
भावों के इस तट पर रहा
मेरा गागर रीता
असमंजस में ही वक्त गवाँया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
कई बार दिल ने चाहा
गेसू तले रात बिताना
श्यामल तन से लिपट कर
मधुर-सा एक गीत गाना
मन की इच्छा से हाय
नियति का दानव जीता
गीतों-गज़ल दूर छंदों
से भी रहा अछूता
असमंजस में ही वक्त गवाँया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
दोस्तों ने बहुत उकसाया
स्नेही जनों ने ढाँढस बँधाया
मेरे अंतर्मन ने ही
लेकिन मेरा न कुछ साथ निभाया
अपनों के अपनेपन से
गैरों का बेगानापन जीता
भाग्य को समझा, कर्म को जाना
बिना पढ़े मैंने गीता
असमंजस में ही वक्त गवाँया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
Friday, April 23, 2010
तृष्णा बनकर आए कोई
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
जर्जर तन था पहले ही
उस पर ये असीम प्रहार
बना निर्दयी जब जग सारा
लगता कोई नहीं हमारा
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
युग बीते कुछ न लिख पाया
खालीपन जीवन में छाया
प्रेरणा बनकर आए कोई
भर जाए जो रिक्त भावों को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
कुछ भी अच्छा लगता नहीं
कोई आस, कोई अरमां, उमंग नहीं
तृष्णा बनकर आए कोई
जागृत कर दे मेरी इच्छाओं को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
खुद पर ही प्रतिबंध लगाकर
बैठा हूँ निषेध द्वार पर
निर्भय बनकर आए कोई
तोड़े जो सब वर्जनाओं को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
Thursday, April 22, 2010
दो बूँद हमें भी दो साकी
रोशनी की मधुशाला से
दो बूँद हमें भी दो साकी
माना उजियारा है तेरे आँगन
तेरे आँगन है दीपों की बारात
कवि के मन अंबर में
लेकिन तिमिर निशा है बाकी
रोशनी की मधुशाला से
दो बूँद हमें भी दो साकी
है याद तुझे तेरे आँगन
उजियारे की खातिर
मन को जलाकर अपने
राह तुझे दिखलाई थी
इस भटके राही को मंजिल तक
पहुँचाने की अब तेरी बारी साथी
रोशनी की मधुशाला से
दो बूँद हमें भी दो साकी
मैं यदि उजियारा पाऊँ
तो तुमको उजियारा दूँ
नवगीत लिखूँ, लयबद्ध करूँ
नेह-रश्मियाँ तुम पर बरसाऊँ
मुझको मेरे हिस्से की दो मधु
नीरव मतवाला हो ताकि
Wednesday, April 21, 2010
प्रीत की प्रत्याशा
रे कवि अब बदल ले
अपनी कविता की भाषा
जिसके लिए तू जनम भर
दर्द को पीता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
अश्क बन जीता रहा
देख वो मनमीत तेरे
देख वो हमप्रीत तेरे
तेरे घावों पर नमक छिड़क
मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की अभिलाषा
जिनके लिए तू जनम भर
कोयल बन गाता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
मधुगीत बनाता रहा
देख वो ही तेरे साथी
देख वो ही तेरे प्रीतम
तेरी डोली के आगे
मर्सिया गा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे मधुगीत सुन पाने की आशा
जिनके कदमों के निशां से
तू कदम अपने मिलाता रहा
जिनकी राहों में हरदम तू
दिल अपना बिछाता रहा
देख वो हमराह तेरे
देख वो हमराज तेरे
चौराहे पर तुझे खड़ा कर
अपनी मंजिलों को जा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की प्रत्याशा
अपनी कविता की भाषा
जिसके लिए तू जनम भर
दर्द को पीता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
अश्क बन जीता रहा
देख वो मनमीत तेरे
देख वो हमप्रीत तेरे
तेरे घावों पर नमक छिड़क
मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की अभिलाषा
जिनके लिए तू जनम भर
कोयल बन गाता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
मधुगीत बनाता रहा
देख वो ही तेरे साथी
देख वो ही तेरे प्रीतम
तेरी डोली के आगे
मर्सिया गा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे मधुगीत सुन पाने की आशा
जिनके कदमों के निशां से
तू कदम अपने मिलाता रहा
जिनकी राहों में हरदम तू
दिल अपना बिछाता रहा
देख वो हमराह तेरे
देख वो हमराज तेरे
चौराहे पर तुझे खड़ा कर
अपनी मंजिलों को जा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की प्रत्याशा
Tuesday, April 20, 2010
रंग अपना बदलना छोड़ दो
मुझको भाता बहुत है साथ तनहाइयों का
हो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
था नाजुक मगर मुझसे टूटा नहीं
काँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दो
तुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ा
इस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दो
कोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगा
मगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दो
जुर्म तुमने किए हमने उफ न किया
नहीं प्यार का यह तरीका इसे छोड़ दो
दिन बदलते है नीरव सबके एक दिन
हर घड़ी रंग अपना बदलना छोड़ दो
हो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
था नाजुक मगर मुझसे टूटा नहीं
काँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दो
तुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ा
इस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दो
कोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगा
मगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दो
जुर्म तुमने किए हमने उफ न किया
नहीं प्यार का यह तरीका इसे छोड़ दो
दिन बदलते है नीरव सबके एक दिन
हर घड़ी रंग अपना बदलना छोड़ दो
Sunday, April 18, 2010
किसके लिए, किसके लिए
लिखूँ किसके लिए, किसके लिए
जिसे लुभाने की खातिर साक़ी बन
मधुमय मधु गीतों को गाता रहा
उसने मुझे विषघट समझ कर
दूर नीरव अधरों से किया
रोऊँ किसके लिए, किसके लिए
जग जो मुझे संताप दे
दर्द दे हृदय पर आघात दे
उनको समझता रहूँ अपना
क्यों अश्रु हँसी में ढाल लूँ
करूँ, किसके लिए, किसके लिए
जिसको समझकर धर्म अपना
मैंने अनवरत पालन किया
जग ने अपनी परिभाषा से
उस कर्म को अधर्म कहा
डरूँ किसके लिए, किसके लिए
अंत के जिस फासले को
बनाए रखा था निरंतर
वो प्रारंभ से साथ मेरे
मुझपर दया से मुस्कुराता रहा
मरूँ किसके लिए, किसके लिए
अपनी छाती को बना ढ़ाल
जिसके हेतु अग्निशर खाता रहा
वो मीत मेरा पीछे खड़ा
कुटिलता से मुस्कुराता रहा
लिखूँ किसके लिए, किसके लिए
मन से दूर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
उन बिन जीवन ऐसे लगता
मानों शरीर बिन प्राण
उन बिन जीवन ऐसे लगता
मानों नौका बिन सागर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
कल जहाँ था कोलाहल
आज वहाँ नीरवता छाई
पायल की झंकार हुई गुम
बजता नहीं कोई नूपुर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
प्यासे को न दो हलाहल
मयकश को न रखो दूर मधु से
जीवन जिसका हो मदहोशी
उसे रहने दो नशे में मग़रूर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
Friday, April 16, 2010
मनमीत नहीं हो पास
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
मन उखड़ा-उखड़ा रहता है
आँखें रहती है खोई सी
जब अश्रु भरे हो नैन
कैसे खुलकर हँस पाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
कंठ अवरूद्ध सा रहता है
स्वर में है नीरवता छाई
जब हृदय में हो तीर चुभे
कैसे मधुगीत गाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जग में है कोलाहल छाया
मन मेरा है निःशब्द सा
ले गया है साज़ कोई
अब कैसे राग बजाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
हर साया लगता है हो मीत
हर आहट लगता हो प्रियतम
खोज में हूँ विरही नीरव की
जिसको पीड़ा अपनी बतलाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
मन उखड़ा-उखड़ा रहता है
आँखें रहती है खोई सी
जब अश्रु भरे हो नैन
कैसे खुलकर हँस पाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
कंठ अवरूद्ध सा रहता है
स्वर में है नीरवता छाई
जब हृदय में हो तीर चुभे
कैसे मधुगीत गाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जग में है कोलाहल छाया
मन मेरा है निःशब्द सा
ले गया है साज़ कोई
अब कैसे राग बजाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
हर साया लगता है हो मीत
हर आहट लगता हो प्रियतम
खोज में हूँ विरही नीरव की
जिसको पीड़ा अपनी बतलाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
Thursday, April 15, 2010
एक बात कहूँ
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
कैसे मुझ बिन दिन काटे तनहा
कैसे बीती मुझ बिन शामें
देर सुबह तक सोई अधजागी-सी
कैसे जाग कर तुमने काटी अपनी रातें
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
कैसे कलियों के संग मुस्काईं
कैसे फ़ूलों संग मुरझाईं
कभी उजालों से संग सोई
कभी अँधेरों के संग की बातें
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
कैसे जाड़ों में आ गया पसीना
जब याद किया मेरा चुंबन
घनी छाँव सी शीतलता पाईं
कैसे मेरी याद तले आके
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
सावन कैसे बरसा रिमझिम
कैसे नयनों से आँसू बरसे
कैसे घनघोर घटा छाई
कैसे आईं मुझ बिन बरसातें
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
हम भी एक बात कहें
यदि कह डाली हो तुमने अपनी बातें
काटा है दौरे जुदाई रो-रोकर
नहीं रहे हम भी हँसते-मुस्कुराते
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
स्वप्निल-सा एक साल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
दुख की चिंता क्यों करूँ
सुख ही सुख है पाया
सब इच्छाएँ पूरी हुईं
मन में रहा न कोई मलाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
प्रतिबंध लगे हो नज़रों पर
दिल पर लगाए पहरे कौन
खुद प्रश्न ही उत्तर हुए
अब पूछे कौन सवाली
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
पूनम का उजियारा भी पाया
मावस का तम भी छाया
झूठा तेरा गुस्सा देखा
देखा शर्म से होना तेरा लाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
देस रहे या रहे विदेस
दिल रहा सदा तुम्हारे पास
चार पहर बारह मास
रहा यही बस एक हाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
बाँके नैन शोख अदा
मीठे बैन चंचल मन
मधुर अधर कोमल तन
मदमाती अँगड़ाई देखी
देखी इठलाई सी चाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
तेरे होंठों पर थी स्मित
मेरी खुशी का ये राज़
नशीली आँखों से न देख नीरव
दिल में उठता है भू-चाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
Monday, April 12, 2010
उड़ जाएगा ये विहग भी
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
एक दिन इसने बड़े जतन से
अपना नीड़ बनाया था
अपने ख़्वाबों सा ही उसको
हर यतन सजाया था
ये मंजिल नहीं रे इसकी
कल ये अपने पथ पर जाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
आया था जब यह मतवाला
हर साक़ी दीवानी थी
अपने हाथों से भर प्याला
करती थी सब मनमानी थी
जिसको सुखकर हो हलाहल
मधुशाला में कब तक रूक पाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
गुलशन में जब ये खिला
मौसम का बदला था नज़ारा
इस फूल को पाने हेतु
हर मधुकर ललचाया था
खिलकर मुरझाना नियति सबकी
यह कैसे बच पाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
हर खुशी चंद दिन की
बाद अँधेरी रात है
उम्र प्यार की कम होती है
जग देखी ये बात है
आज ही कह ले, कर ले नीरव
यह वक्त न फिर पाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
Sunday, April 11, 2010
ख़त
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
दर्द भरे अफ़सानों को,
घोल अश्कों की स्याही में
जज़्बातों को कलम बनाकर
दिल पर उकेरे जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
संबोधन क्या दें? बस
इसी विवशता के कारण
लिफ़ाफ़े में भरकर
कोरे ही भिजवाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
कभी बाद संबोधन के
लरज़ती काँपती ऊँगलियों से
मुश्किल से वही तीन अल्फ़ाज
बार-बार बनाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
ढेर सारा लिखकर भी
और लिखने की ख़्वाहिश से
हाशियों पर तारीफ में
चंद शेर लिख दिए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
लिखने वाला लिखता ही नहीं
पाने वाला पाता ही नहीं
आँखों से आँखों तक लेकिन
रोज़ाना पहुँचाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
कभी हवाओं के दामन पर
कभी बादलों के सीने पर
लिखकर फूलों की खुश्बू से
नीरव तक पहुँचाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
मधुमौसम में जाने वाले
विदा प्रिय ! हो शुभ चिरप्रवास
फूल रहे टेसू यहाँ
अमराई बौरा रही
चटख रहा कचनार भी
दहक रहा पलाश
ऐसे मधुमौसम में जाने वाले
विदा प्रिय! हो शुभ चिरप्रवास
स्वर गुंजित रहेगा तेरा
गूँजेगी तेरे पंखों की परवाज
अपने ध्येय को जाने वाले
विदा प्रिय ! हो शुभ चिरप्रवास
तेरी आहट, तेरी साँसे
और मधु-स्वर तेरा
साथ गुजारे लम्हों की
छोड़े जाना याद
ओ यादों को छोड़े जाने वाले
विदा प्रिय ! हो शुभ चिरप्रवास
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about me
- डॉ. राजेश नीरव
- मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।





















