Thursday, April 26, 2012

धूप पहाड़ों की


पहले छूती है
फुनगियाँ
फिर पत्ते
फिर शाख
तना
और अंत में जमीन को
.........................
धूप पहाड़ों की
प्यार की तरह नहीं
करूणा की तरह आती है
झनझनाती नहीं
जड़ों तक को
आहिस्ते से
सहला जाती है

सफेद तितलियाँ


उतनी ही चपल-चंचल,
ढेर-की-ढेर हैं ... मगर
हैं सफेद, तितलियाँ
पहाड़ों की
इनको देखकर
करूणा का भाव आता है

तेज धूप के हों हजार नुकसान,
किंतु
जीवन में रंग
उसी से आता है

शायद इसी से
समतल से ऐश्वर्य का
और पहाड़ों से वैराग्य का
गहरा नाता है..

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।