Monday, June 7, 2010

तुमको रास मौन की भाषा


मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
चाहे सदा ये मन मेरा
सजा कर स्वर की रंगोली
युगल स्वर में लगाए
नेह के गीतों की बोली
मैं ललक कर जब पास आता
मौन के समक्ष दब जाती पिपासा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
इंद्रधनुष से ढेर सारे रंगों को मैं चुरा लूँ
लेकर तेरा दामन, चोरी से
गगन-सा उसको सजा दूँ
रूक जाते बढ़ते हाथ मेरे
देख तेरी नीरस प्रत्याशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
पास आकर मैं जो तेरे
हाथ से कुछ चाहता हूँ
तू इशारों से उस तक
पहुँचा देती है मुझे
मैं चाहता स्पर्श तेरा
हरदम मिलता मुझे निराशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा

2 comments:

  1. सुंदर भाव! रचना की तरलता और बेहतर हो सकती थी ... बधाई

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  2. nice bahut khub

    मैं मुखरित हर क्षण हर पल
    तुमको रास मौन की भाषा

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।