Monday, August 22, 2011

फिक्रमंद-ए-दीन-ओ-दुनिया


रात को महताब दिन में आफताब रहती है
नाजुक है मगर गुस्से में गुलाब रहती है
फिक्रमंद रहती है दीन-ओ-दुनिया के लिए
खुद ही के लिए लाजवाब रहती है
अक्सर गुम रहती है अपने आप में भले
कहने पे आए तो रूह को बेनकाब करती है
जान लेती है हाल मेरा बिना कुछ पूछे
अपने हाल पर मगर हिजाब रखती है
हम अक्सर एक-दूसरे से सहमत नहीं होते
जाने कैसे वो मुझसे निबाह करती है

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।