Sunday, December 22, 2013

सुख ने थोड़ा हमें थकाया




मैं अपने पिता-सा मजबूत कहाँ हूँ
तुम ही अपनी माँ-सी सुघड़ कहाँ
अलस्सुबह दिन होता था, रात देर से ढलती थी
दौर बदला, बदले हम, शाम कहाँ वो, सहर कहाँ
मेरी ज़द में दसों दिशाएँ, जह हम अलग-अलग थे
एक लीक पर अब हम-तुम, पहले वाली हुलस कहाँ
सुख ने थोड़ा हमें थकाया, तोड़ा भी हमको थोड़ा
हाड़-तोड़ मेहनत वाली, वो पसीने की महक कहाँ
सब कोई अपने थे, हर लम्हा जीते थे
लोग कहाँ वो रीत कहाँ, साज़ कहाँ वो गीत कहाँ

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।