Wednesday, February 26, 2014

न कृष्ण, न बुद्ध


कुछ
सौंदर्य से
दूर रहे
बेचैन रहे
कुछ
पास रहकर भी
बेज़ार रहे
कुछ को
व्यापा ही नहीं यह
पास रहे, दूर रहे
निर्विकार रहे
..................
ऐसे दुनियादार
लोगों से ही
दुनिया
गुलज़ार रहे

दिन बासंती कम हो गये

ऋतु-मौसम आगे खिसक गये
दिन बासंती कम हो गये
सर्दियाँ मार्च तक गर्मियाँ अप्रैल से
दिन बहारों के कम हो गये
शादी शाही होने लगीं ज्यादा
दिन साथ रहने के कम हो गये
लोगों से मिलने-जुलने में
दिन तन्हाई के कम हो गय
शामो-सहर एक बैचेनी सी
दिन फुर्सत के कम हो गये

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।