Monday, June 14, 2010

मैं तो मायूस लौटा हूँ


जरूरी नहीं कि चीजें सुलझती है अक्ल के हवाले से
मैंने तो अक्सर सुलझते देखा है इन्हें हीले-हवाले से

गर तेज हो हवा तो गुल हो जाती है शमा
कुछ दिए जब भी जलते रहते हैं तूफान में मतवाले से

मौत अजीब शै है, दूर कर देती है शक्लो सूरत
याद कहाँ छीन पाता है कोई माशूक की दिलवाले से

तुम्हें मिला होगा ख़ुदा, मुबारक़ हो, गर मिला
मैं तो मायूस लौटा हूँ, हर दीनो-हरम, मस्जिद-ओ-शिवाले से

वो मेरी गोद, मेरे कांधे पे रोकर हल्के हुए
मैं अपने छालों को सहलाऊँ, किस रिसाले से

1 comment:

  1. स्मृति के झरोखे से
    निहारते हुए
    पावन पवित्र प्रकृति
    के रूप को

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।