Saturday, June 5, 2010

मेरी पीड़ा और एकाकी मन


अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
अपने से ही बात करूँ
अपने सुख-दुख का हाल कहूँ
अपने घावों को खुद सहलाऊँ
खुद अपनी पीड़ा को गाऊँ
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
सत्य के क्षितिज पर पहुँच कर
अंतिम सत्य शून्य ही पाता
यह नहीं अंतिम सत्य
क्यों बार-बार मैं दोहराता
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
एकाकी है मेरा तन-मन
मंजिल मेरी एकाकी
दो पल साथ मिला किसी का
बाकी जीवन एकाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
कितनी दूरी तय कर ली
कितना त्रास भोग चुका
नहीं मील का पत्थर पथ में
समझूँ कितना चलना है बाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन

1 comment:

  1. बहुत भावनात्मक रचना...अच्छी लगी

    ReplyDelete

मेरा काव्य संग्रह

मेरा काव्य संग्रह

Blog Archive

Text selection Lock by Hindi Blog Tips

about me

My photo
मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।