Wednesday, June 9, 2010

एक सीमाहीन वृत्त


एक धुँधले से आलोक में
मैंने चाहा
उसे घेर लूँ
एक वृत्त बनकर
मैंने यत्न किया
कभी चित्रकार
कभी मूर्तिकार
कभी कवि बना
मेरे सब प्रयास
निष्फल हुए
और स्वप्न के एक
जागरण में
मैंने देखा
वह मुझे घेरे हुए है
क्योंकि
वह स्वयं
एक सीमाहीन वृत्त था

3 comments:

  1. वाह वाह

    प्रस्तुति...प्रस्तुतिकरण के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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  2. बहुत सुन्दर !

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।