Thursday, June 9, 2011

बिना दिल के जीता हूँ


एक दिन मैंने सोचा
अपने दिल के सारे टुकड़े
ढूँढकर लाऊँगा
फिर से इन्हें जोड़कर
नया दिल बनाऊँगा
खोज से लौटा तो
एक टुकड़ा और कम था
देखा था मैंने
दिल के टुकड़ों पर
लोगों ने अपने
आशियाने खड़े कर लिए हैं
रास्ते में एक शख्स
निराश खड़ा था
उसके पास
नींव में डालने को
कुछ भी न था
मैं
आखिरी टुकड़ा भी उसे दे आया
और खुद बिना दिल के जीता हूँ

Tuesday, June 7, 2011

एक उलझन ही सही


एक उलझन ही सही मगर कुछ है तो सही
उनके पास तो सिवा खालीपन के कुछ नहीं
इतना यकीन था खुद पर और परस्तिश पे
इबादत को खड़े हुए तो खामोशी ही पढ़ते रहे
कभी अजान देता मैं और काश कि वो आते
खुदा न सही, उसकी खुदाई के दीदार तो हो जाते
हाय री किस्मत क बेरहमी को देखिए
वो आते हैं मेरे सामने हमेशा बुत बनके
कभी बुत भी बोलेगा क्या बता दीजिए
(समझ लो जुबा खामोशी की खुद ही यार)
बुत को बोलने की सजा तो न दीजिए

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।