Friday, June 4, 2010

क्यों लिखूँ गीत वेदना के


क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
तू मेरे गीतों को पढ़, मेरी
भावुकता पर तरस खाए
और स्वयं की जीत पर
मंद-मंद मुस्कुराए
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
मैं अपनी भावुकता को तज
अपनी राह बनाऊँगा
जो तेरे दर तक पहुँचाए
उस राह कभी ना आऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
कभी था चाहा तुझे बहुत
अब पाने को अरमान नहीं
पास मेरे भी हैं प्रतीक्षित
तू ही एक पैगाम नहीं
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
याद करके मेरा प्रणय
नयन एक होंगे एक दिन सजल
दूर बहुत दूर लेकिन तब
तलक मैं चला जाऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ

2 comments:

  1. bahut khub



    फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।