Saturday, June 4, 2011

खुद बिना दिल के जीता हूँ


एक दिन मैंने सोचा
अपने दिल के सारे टुकड़े
ढूँढकर लाऊँगा
फिर से इन्हें जोड़कर
नया दिल बनाऊँगा
खोज से लौटा तो
एक टुकड़ा और कम था
देखा था मैंने
दिल के टुकड़ों पर
लोगों ने अपने
आशियाने खड़े कर लिए हैं
रास्ते में एक शख्स
निराश खड़ा था
उसके पास
नींव में डालने को
कुछ भी न था
मैं
आखिरी टुकड़ा भी उसे दे आया
और खुद बिना दिल के जीता हूँ

Thursday, June 2, 2011

कोई आँसू लेकर स्मित दे जाए


खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
मन का दामन छोटा हो और ढेरों खुशियाँ मिल जाए
तन पर रक्तिम कोना हो और ढेरों मरहम मिल जाए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
कंठ सून हो पथिक का और कदम लड़खड़ा रहे हो
साकी मदपात्र लिए ऐसे में खुद प्यासे तक आए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
सृजन की इच्छा हो मन में न शब्द मिले न भाव
ऐसे में आकर कोई मधु छंद लिखवा जाए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
सारी खुशियाँ पराई लगे जब गम ही अपना साथी हो
तन्हाई का साथी बनकर कोई आँसू लेकर स्मित दे जाए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे

Wednesday, June 1, 2011

तुम मेरे आकाश हो


मैं तुम्हारा आकाश हूँ
तुम मुझमें विचरण करते हो
तुम मेरे आकाश हो
तुम में मैं उड़ता फिरता हूँ
हम दोनों पंछी
एक-दूसरे के
हम दोनों आकाश
तुम चाहती हो उड़ना
मुझसे बाहर के आकाश में
तुम्हें अपने आकाश पर
विश्वास है
वह तुम्हारा ही रहेगा हरदम

Tuesday, May 31, 2011

कुकनूस है सचमुच कवि भी


कुकनूस जो जुटाकर
काष्ठ, टहनी
और चिता-सी उसको सजाकर
वेदना भरे हृदय से
रागमय मृत्यु-गीत गाता
गीत की उस ध्वनि से
हो जाते अग्निदेव प्रकट
और तदंतर
लपटें, लपककर
उस चिता को है जलाती
स्वयं की देह को वह
अग्नि को सौंप देता
अग्नि-स्नान की इस प्रक्रिया से
भस्म ही अवशेष रहता
उस राख से जन्म लेता
एक और कुकनूस अभिनव
कवि भी अग्नि-स्नान की इस यंत्रणा से
नित्य-प्रति है गुजरता
किंतु त्रासदी यह भयंकर
पूर्ण दग्धता को
वह पाता नहीं
अधजला रहकर
नित्य अपनी ही जलन में
प्रतिक्षण है जलता रहता

Monday, May 30, 2011

मार्क्सवाद की प्रथम प्रचारक


एक जगह
लेंपपोस्ट का मद्धम
आलोक था
आदमी से बड़ी
जहाँ से थी परछाइयाँ
एक अकेले शख्स को
वहाँ मैंने सिसकते पाया
पूछा नाम
तो वो बोला
करूण और दीन होकर
मैं
हैव्स नॉट/ सर्वहारा
एक जगह
थी कैंडल लाइट की सुरमई रोशनी
धीमे-धीमे संगीत में फ्लोर पर
एक शख्स को थिरकते पाया
आपका परिचय
मैं- वह धीमे से मुस्कुराया
मैं हैव्स/ बुर्जुआ
मैं उधेड़बुन में रहा
परेशानी में घिरा
चल पड़ा गम भुलाने
सागर से प्यार बुझाने
एक ही टेबल पर वहाँ
बैठे मैंने दोनों को पाया
तब मुझे बच्चन का
स्मरण सहज हो आया
मार्क्सवाद की प्रथम प्रचारक
मेरी प्यारी मधुशाला

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।