Tuesday, April 20, 2010

रंग अपना बदलना छोड़ दो

मुझको भाता बहुत है साथ तनहाइयों का
हो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
था नाजुक मगर मुझसे टूटा नहीं
काँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दो
तुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ा
इस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दो
कोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगा
मगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दो
जुर्म तुमने किए हमने उफ न किया
नहीं प्यार का यह तरीका इसे छोड़ दो
दिन बदलते है नीरव सबके एक दिन
हर घड़ी रंग अपना बदलना छोड़ दो

4 comments:

  1. waah neerav sahab kya khoob likha...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  2. बहुत बढ़िया.


    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  3. हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।