Thursday, May 27, 2010

ताकि तराश सकूँ....


लिखता रहा
ताकि मर ना जाए
उन क्षणों की अनुभूतियाँ
जिन्हें मैंने जिया
जिंदा रहे वह मधुरस
और हलाहल
अपनी खुशी से
वक्त के हाथों
जिसे मैंने पिया
लिखता रहा
ताकि बने रहे
उन ज़ख़्मों के निशां
जिन्हें अपने ही हाथों
अकेले में मैंने सिया
लिखता रहा
ताकि फूटती रहे कोंपलें
[दर्द के दरख़्त से
जिस्म और रूह में
अपने ही हाथों
जिसे मैंने बोया
लिखता रहा
ताकि तराश सकूँ
अपने ही बुत को
मेरे ख़्वाबों ने
मेरी आँखों में
जिसे हर रात संजोया
लिखता रहा.....लिखता रहा....

3 comments:

  1. लिखने की बैचेनी..........अनुभूतियों का आकर्षक व कलात्मक प्रकटीकरण.......सुन्दर, सशक्त व सार्थक रचना..शुभकामनाएं।

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  2. जिंदा रहे वह मधुरस
    और हलाहल
    अपनी खुशी से
    वक्त के हाथों
    जिसे मैंने पिया
    लिखता रहा
    ताकि बने रहे
    उन ज़ख़्मों के निशां
    जिन्हें अपने ही हाथों
    अकेले में मैंने सिया

    भावनाओं को खूबसूरत शब्द दिए हैं...खूबसूरत रचना

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  3. वाह! कमाल की रचना है!
    www.vandematarama.blogspot.com

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।