Monday, May 10, 2010

मधु ऋतु


दूर कहीं कोयल बोली
वीरान पड़ा था कब से गुलशन
तितली, भँवरे, माली थे चुप
तनहा-तनहा लगता मौसम
ऐसे में यह मधुबोली
दूर कहीं कोयल बोली
कलियाँ मुस्काएँगी अब
बहारें आएँगी गुलशन में
भँवरे फूलों पर मँडराएँगें
होगी फूलों संग आँख-मिचौली
दूर कहीं कोयल बोली
खुशनुमा होगा हर लम्हा
मधु ऋतु होगी बगियन में
खुशबू से सराबोर होंगी साँसें
रंगों की सजेगी रंगोली
दूर कहीं कोयल बोली
फूलों के संग होगी बातें
कलियों संग कटेगी रातें
स्मित होगी हर अधर पर
नयनों में होगी  नीरव बोली
दूर कहीं कोयल बोली

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।