Friday, April 23, 2010

तृष्णा बनकर आए कोई


कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
जर्जर तन था पहले ही
उस पर ये असीम प्रहार
बना निर्दयी जब जग सारा
लगता कोई नहीं हमारा
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
युग बीते कुछ न लिख पाया
खालीपन जीवन में छाया
प्रेरणा बनकर आए कोई
भर जाए जो रिक्त भावों को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
कुछ भी अच्छा लगता नहीं
कोई आस, कोई अरमां, उमंग नहीं
तृष्णा बनकर आए कोई
जागृत कर दे मेरी इच्छाओं को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
खुद पर ही प्रतिबंध लगाकर
बैठा हूँ निषेध द्वार पर
निर्भय बनकर आए कोई
तोड़े जो सब वर्जनाओं को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को

3 comments:

  1. bahut khoob sir...khud par hi pratiandh lagakar...ye panktiyan bahut achchi lagi...

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  2. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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  3. सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।