ख़ास हो चली थी आदत लिखने की,आम हो गई .
वो कहीं भी रहे , आबाद हूँ, दिल में बसा रहता है
एक गली का क्या, गर गुमशुदा-गुमनाम हो गई .
उसका कद ही नहीं,कदे-सुखन भी है मेरे बराबर
वो मेरा दोस्त है, ज़िन्दगी मुझ पे मेहरबान हो गई .
चल पड़ा है मेरी ओर वो, मुश्किलों मुकम्मल देख लो
बाद न कहना, हम न थे इसी से मंज़िल आसां हो गई .
ये दुनियावी झमेले,दुश्वारियां औ गमे-दुनिया के दरमियां
तुम मिले तो लगा, नेमतों से अब मेरी पहचान हो गई .