Friday, April 16, 2010

मनमीत नहीं हो पास

कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
मन उखड़ा-उखड़ा रहता है
आँखें रहती है खोई सी
जब अश्रु भरे हो नैन
कैसे खुलकर हँस पाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
कंठ अवरूद्ध सा रहता है
स्वर में है नीरवता छाई
जब हृदय में हो तीर चुभे
कैसे मधुगीत गाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जग में है कोलाहल छाया
मन मेरा है निःशब्द सा
ले गया है साज़ कोई
अब कैसे राग बजाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
हर साया लगता है हो मीत
 हर आहट लगता हो प्रियतम
खोज में हूँ विरही नीरव की
जिसको पीड़ा अपनी बतलाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।