Friday, May 14, 2010

भूल गया हूँ, तब से खुदा को


रोको चाहे मुझको जीने से
मत रोको यारों पीने से
गम बढ़ता है जीने से
खलिश मिटती है पीने से
पीकर एक लम्हा जीना है अच्छा
बिन पिए बरसों जीने से
कैसे रिंद हो जो डरते हो
नशीली नजरों से पीने से
काफिर मुझको कहते हैं, लोग
बंदगी मेरी, तेरे हाथों पीने से
भूल गया हूँ, तब से खुदा को
लगा जबसे हूँ तेरे सीने से
रोको चाहे मुझको जीने से
मत रोको यारों पीने से

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।