Sunday, May 30, 2010

बरखा गीत


दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
मेघमय आकाश सारा
आच्छन्न है हरीतिमा पर
हौले से आकर गालों पर
टकराती है बूँद कोई
तनमन सिहर सा जाता
मन कहता है स्वयं से
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
रोम-रोम पुलक उठता
मात्र जिसके स्मरण से
बह चली है मधुर गति से
अल्हड़-सी वो पुरवाई
वो जो मुझसे दूर कहीं है
रे तू सहेली है न उसकी
जा जरा उसको जगा दे
रूठ कर जो है सोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
बूँद बनकर बरस
रिमझिम-रिमझिम नृत्य कर
मैं चातक-सी तृष्णा लिए
जोहता हूँ बाट तेरी
पावस की इस ऋतु में
हम-तुम हो जाए समरस
मैं मस्त मतवाला बन जाऊँ
तुम रख लो साक़ी वेश कोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई

3 comments:

  1. बहुत खूबसूरत बरखा गीत ..ठंडक का एहसास करता हुआ ..


    आपकी यह पोस्ट ...चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर मंगलवार १.०६.२०१० के लिए ली गयी है ..
    http://charchamanch.blogspot.com/

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।