Saturday, May 15, 2010

मैं दागदार चाँद हूँ गगन का


रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
इस तरह से प्रणय हुआ संभव कहीं है
संस्कार मुझसे छूटने वाले नही
और तू नहीं लाज तजना चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
इस तरह आराधन भी अच्छा नहीं है
मैं निरा-निपट पाषाण और
तू देव मूरत गढ़ना चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
चकोर-सी यह अभिलाषा सच्ची नहीं है
मैं दागदार चाँद हूँ गगन का और
तू निर्मल चाँदनी का स्नान चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
अपराधी पर इतना विश्वास भी अच्छा नहीं है
मैं गुनाहों का देवता ठहरा और
तू मुझसे पुण्य कर्म चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।