Sunday, June 6, 2010

अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों ?

क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
जीवन पथ की इन राहों में
हैं कितने कंटक और प्रस्तर
घिसट-घिसट अपनी देह को
अनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
है अंतरमन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित लिए
जीवन के इस रंगमंच पर
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
महत्वाकांक्षा को समेटे
दिवास्वप्नों को सहेजे
हृदय और आँखों में अनगिनत
आशा सजा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?

2 comments:

  1. मन के अंतर्द्वंद को बताती अच्छी रचना

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  2. यही जीने का तरीका है मित्र.

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।