Tuesday, April 5, 2011
Friday, April 1, 2011
Monday, March 28, 2011
Sunday, March 27, 2011
खोजने निकला तो
खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर...
कोई चंचल मिला, कोई शांत मिला
कोई खुश मिला, कोई अशांत मिला
कोई बौराया, कोई पगलाया-सा
कोई उदास, कोई निराश मिला
खोजने निकला तो
कोई प्यारा-सा, कोई न्यारा-सा
कोई जीता-सा, कोई हारा-सा
कोई उत्साहित, कोई विथकित
कोई अनुरक्त, कोई विरक्त
कोई यायावर, कोई सैलानी
कोई रमता जोगी, कोई तपी-ध्यानी
खोजने निकला तो
एक तुम ही न मिले
कहीं
ओ अभिमानी
ओ तेजोमय
ओ प्रभामय
ओ अमित स्वरूप
ओ मुझ मृग की तृष्णा के झिलमिल पानी
खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर एक तुम ही मिले
मिले तो बहुत
मगर...
कोई चंचल मिला, कोई शांत मिला
कोई खुश मिला, कोई अशांत मिला
कोई बौराया, कोई पगलाया-सा
कोई उदास, कोई निराश मिला
खोजने निकला तो
कोई प्यारा-सा, कोई न्यारा-सा
कोई जीता-सा, कोई हारा-सा
कोई उत्साहित, कोई विथकित
कोई अनुरक्त, कोई विरक्त
कोई यायावर, कोई सैलानी
कोई रमता जोगी, कोई तपी-ध्यानी
खोजने निकला तो
एक तुम ही न मिले
कहीं
ओ अभिमानी
ओ तेजोमय
ओ प्रभामय
ओ अमित स्वरूप
ओ मुझ मृग की तृष्णा के झिलमिल पानी
खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर एक तुम ही मिले
Saturday, March 26, 2011
ओएसिस की प्यास
जब कभी किसी कारण
तुम्हारी आंतरिक तन्मयता
हो जाती है भंग
तो मन पर एक अनजाना बोझ
छाने लगता है धीरे-धीरे
जो बढ़ता जाता है क्रमशः
और तुम नीरस यथार्थ के तंग रास्तों पर चलने को
मजबूर हो जाती हो
और छोड़ बैठती हो
मूल शांत व्यक्तित्व
कभी-कभी सोचता हूँ
बेचारा आम आदमी
कतई दोषी नहीं
अपने ढर्रे के जीवन से उपजे
उथले और सतहीपन के लिए
क्योंकि उसके पास तो कोई
आंतरिक स्रोत भी नहीं
जहाँ तर-तृप्त होकर
वह शांत हो सके
तुम्हारी आंतरिक तन्मयता
हो जाती है भंग
तो मन पर एक अनजाना बोझ
छाने लगता है धीरे-धीरे
जो बढ़ता जाता है क्रमशः
और तुम नीरस यथार्थ के तंग रास्तों पर चलने को
मजबूर हो जाती हो
और छोड़ बैठती हो
मूल शांत व्यक्तित्व
कभी-कभी सोचता हूँ
बेचारा आम आदमी
कतई दोषी नहीं
अपने ढर्रे के जीवन से उपजे
उथले और सतहीपन के लिए
क्योंकि उसके पास तो कोई
आंतरिक स्रोत भी नहीं
जहाँ तर-तृप्त होकर
वह शांत हो सके
Friday, March 25, 2011
रचना में रहूँ तो मैं 'मैं' कैसे रहूँ
लिखूँ तो मैं केवल पुरुष कैसे रहूँ
क्योंकि मुझे निबाहनी है
मेरी ही नहीं
तुम्हारी भी कथा... व्यथा और अनुभूतियाँ
केवल अपने सत्य के सापेक्ष कैसे रहूँ
क्योंकि मैं तुम्हारे भी सापेक्ष हूँ
या तो स्वयं से भी निरपेक्ष रहूँ, तटस्थ रहूँ
या तुमको भी
रचना में स्वर दूँ
रचना में रहूँ तो
मैं
मैं कैसे रहूँ
ओ संगिनी
मैं तुमको संग ले
कुछ और ही हो जाऊँ
जब रचनारत होऊँ
क्योंकि मुझे निबाहनी है
मेरी ही नहीं
तुम्हारी भी कथा... व्यथा और अनुभूतियाँ
केवल अपने सत्य के सापेक्ष कैसे रहूँ
क्योंकि मैं तुम्हारे भी सापेक्ष हूँ
या तो स्वयं से भी निरपेक्ष रहूँ, तटस्थ रहूँ
या तुमको भी
रचना में स्वर दूँ
रचना में रहूँ तो
मैं
मैं कैसे रहूँ
ओ संगिनी
मैं तुमको संग ले
कुछ और ही हो जाऊँ
जब रचनारत होऊँ
Thursday, March 24, 2011
जल...जल...जल..
मुझको अर्घ्य में जल नहीं अग्नि रूचति है
सूर्य! क्या तुम अपनी देय पुनः स्वीकारोगे
कष्ट...कष्ट...कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल जल-सा ही
मगर मैं उमड़ा हूँ
जल...जल...जल..
सिंधु ! क्या तुम अपनी विवशता पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी कोई रत्न पाया
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष... संघर्ष... संघर्ष...
जीवन क्या तुम अपनी हठ पुनः स्वीकारोगे
सूर्य! क्या तुम अपनी देय पुनः स्वीकारोगे
कष्ट...कष्ट...कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल जल-सा ही
मगर मैं उमड़ा हूँ
जल...जल...जल..
सिंधु ! क्या तुम अपनी विवशता पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी कोई रत्न पाया
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष... संघर्ष... संघर्ष...
जीवन क्या तुम अपनी हठ पुनः स्वीकारोगे
Sunday, March 20, 2011
समय... समय... समय...
कभी सघन
कभी विरल
कभी सुनहरा
कभी बदरंग
कभी स्याह
कभी सतरंग
...............
मैं रंगों की नहीं
समय की बात कर रहा हूँ
कभी सापेक्ष
कभी निरपेक्ष
कभी घोर अँधेरे-सा
कभी रोशन किरण-सा
कभी रेशमी-मुलायम
कभी सख़्त फौलाद
अजीब गोरखधंधा है समय
कभी स्वर्णमृग बन जाता है
कभी अमृत-कलश बिंधवाता है
कभी लड़ता है युद्ध
कभी निष्कासन
कभी जल-समाधि दिलवाता है
समय
कभी बँट जाता है युगों में
कभी सतत चलता जाता है
कभी हारता है खुद से
कभी सबको हराता जाता है
समय
अजीब, अद्भुत, अनोखा
अनिर्वचनीय है समय
समय... समय... समय...
कभी विरल
कभी सुनहरा
कभी बदरंग
कभी स्याह
कभी सतरंग
...............
मैं रंगों की नहीं
समय की बात कर रहा हूँ
कभी सापेक्ष
कभी निरपेक्ष
कभी घोर अँधेरे-सा
कभी रोशन किरण-सा
कभी रेशमी-मुलायम
कभी सख़्त फौलाद
अजीब गोरखधंधा है समय
कभी स्वर्णमृग बन जाता है
कभी अमृत-कलश बिंधवाता है
कभी लड़ता है युद्ध
कभी निष्कासन
कभी जल-समाधि दिलवाता है
समय
कभी बँट जाता है युगों में
कभी सतत चलता जाता है
कभी हारता है खुद से
कभी सबको हराता जाता है
समय
अजीब, अद्भुत, अनोखा
अनिर्वचनीय है समय
समय... समय... समय...
Friday, March 18, 2011
अनोखी है विषयों की कायनात
बड़ी अनोखी है विषयों की कायनात
इस ब्रह्मांड में सब
एक के, एक सबके
चक्कर लगाते हैं
राजनीति घूमती है अर्थ के गिर्द
अर्थशास्त्र राजनीति के
दोनों समाजशास्त्र के
और समाजशास्त्र दोनों के
ये सब इतिहास के
इतिहास, भूगोल के
भूगोल, भौतिकी के
भौतिकी घुमाती है
रसायन और जीव विज्ञान को
दोनों गणित के
और गणित
गणित संगीत के
संगीत
नृत्य के
नृत्य साहित्य को घुमाता है अपने चारों ओर
साहित्य सौंदर्यशास्त्र और मनोविज्ञान के
और ये दोनों(!)
दर्शन घुमाता है, इन्हें अपने चारों ओर
अरे यह भँवरों का भँवर
मैं फँस गया हूँ इसमें
बड़ी निराली
दुनिया है विषयों की
यहाँ सब घूमते हैं
एक-दूसरे के गिर्द
जैसे ढेर सारे घूमते लट्टू
परिक्रमा करते, करवाते हैं
दूसरे लट्टूओं की
एक-दूसरे से
इस ब्रह्मांड में सब
एक के, एक सबके
चक्कर लगाते हैं
राजनीति घूमती है अर्थ के गिर्द
अर्थशास्त्र राजनीति के
दोनों समाजशास्त्र के
और समाजशास्त्र दोनों के
ये सब इतिहास के
इतिहास, भूगोल के
भूगोल, भौतिकी के
भौतिकी घुमाती है
रसायन और जीव विज्ञान को
दोनों गणित के
और गणित
गणित संगीत के
संगीत
नृत्य के
नृत्य साहित्य को घुमाता है अपने चारों ओर
साहित्य सौंदर्यशास्त्र और मनोविज्ञान के
और ये दोनों(!)
दर्शन घुमाता है, इन्हें अपने चारों ओर
अरे यह भँवरों का भँवर
मैं फँस गया हूँ इसमें
बड़ी निराली
दुनिया है विषयों की
यहाँ सब घूमते हैं
एक-दूसरे के गिर्द
जैसे ढेर सारे घूमते लट्टू
परिक्रमा करते, करवाते हैं
दूसरे लट्टूओं की
एक-दूसरे से
Thursday, March 17, 2011
Wednesday, March 16, 2011
Tuesday, March 15, 2011
वशिष्ठ
प्रतिभाशाली सुकुमार राम को
तुमने यहीं
मनाली में
अपने बर्फीले फौलाद में ढाला होगा
तभी तो उन्होंने
राक्षसों के सर्वनाश का
व्रत ले डाला होगा
तुमने यहीं
मनाली में
अपने बर्फीले फौलाद में ढाला होगा
तभी तो उन्होंने
राक्षसों के सर्वनाश का
व्रत ले डाला होगा
Monday, March 14, 2011
हिडिंबा
तुम तो राक्षसी थीं
अब तक
हमारे लिए
मायावी राक्षसी
जिसने रचाया था
महाबली भीम से विवाह
और घटोत्कच जन्मा था
शूरवीर पुत्र तुम्हारा
(मगर तुम राक्षसी ही रहीं थीं हमारे लिए)
मनाली में मगर
तुम पूजी जाती हो
देवी हिडिंबा के रूप में भव्य मंदिर है तुम्हारा
.................
सच है भूगोल बदलने से भी
कभी-कभी बदल जाता है इतिहास का नज़ारा
तभी तो मनाली को
अपने सबसे श्वेत बर्फीले खूबसूरत रूप में हमने यहीं निहारा
अब तक
हमारे लिए
मायावी राक्षसी
जिसने रचाया था
महाबली भीम से विवाह
और घटोत्कच जन्मा था
शूरवीर पुत्र तुम्हारा
(मगर तुम राक्षसी ही रहीं थीं हमारे लिए)
मनाली में मगर
तुम पूजी जाती हो
देवी हिडिंबा के रूप में भव्य मंदिर है तुम्हारा
.................
सच है भूगोल बदलने से भी
कभी-कभी बदल जाता है इतिहास का नज़ारा
तभी तो मनाली को
अपने सबसे श्वेत बर्फीले खूबसूरत रूप में हमने यहीं निहारा
Saturday, March 12, 2011
Friday, March 11, 2011
श्वानाली
पांडवों के साथ
युधिष्ठिर के संग
अंतिम शिखर तक
साथ गया था श्वान...
मगर
आया वह सबसे पहले
मनु महाराज के साथ
तभी तो
मनु-आलय
मनाली में
दिख जाती हैं
सर्वत्र
उसी आदि श्वान की
संतान
Wednesday, March 9, 2011
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
झरनों की कल-कल-सी तुम
बर्फ की तरह झरती तुम्हारी हँसी
चीड़ों से आती गंध-सी सुवास
कहीं तुम्हारा साथ न छूट जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
दिन-रात कँपकँपाती यह ठंड
गर्म चाय के गुनगुने स्पर्श-सा सुख
तमाम गर्म कपड़े और गर्म टोप
मैदान में जाते ही यह सब न बीत जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
ऊनी दस्ताने और मफलर ऊनी
कांगड़ी और अलाव की आँच-सी तुम
दूर शिखरों पर जमी बर्फ
सूर्य की किरण से न पिघल जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
नवविवाहित जोड़ों का हनीमून
बाँहों में बाँहें डाले घूमते युगल
मदहोश कर देने वाला समां
ये मादक माहौल न गुम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
कुनमुनाती-सी रजाई से निकलती
बाहर जाने के नाम पर बिसूरती
बाहर निकलते ही बह निकलती
गर्म सोतों-सी यह गर्मी न जम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
बर्फ की तरह झरती तुम्हारी हँसी
चीड़ों से आती गंध-सी सुवास
कहीं तुम्हारा साथ न छूट जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
दिन-रात कँपकँपाती यह ठंड
गर्म चाय के गुनगुने स्पर्श-सा सुख
तमाम गर्म कपड़े और गर्म टोप
मैदान में जाते ही यह सब न बीत जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
ऊनी दस्ताने और मफलर ऊनी
कांगड़ी और अलाव की आँच-सी तुम
दूर शिखरों पर जमी बर्फ
सूर्य की किरण से न पिघल जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
नवविवाहित जोड़ों का हनीमून
बाँहों में बाँहें डाले घूमते युगल
मदहोश कर देने वाला समां
ये मादक माहौल न गुम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
कुनमुनाती-सी रजाई से निकलती
बाहर जाने के नाम पर बिसूरती
बाहर निकलते ही बह निकलती
गर्म सोतों-सी यह गर्मी न जम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए
Tuesday, March 8, 2011
Monday, March 7, 2011
मनाली में धूप
सूर्य को देवता
पहाड़ियों ने माना होगा
सर्वप्रथम-पहली बार
खासकर जहाँ गिरती हो गार
...............................
अंगार को देवता
वे ही तो करेंगे
स्वीकार
...........
-
Saturday, March 5, 2011
Thursday, March 3, 2011
Wednesday, March 2, 2011
Tuesday, March 1, 2011
तन मनाली - मन मणिकर्ण
बर्फ...बर्फ...बर्फ
प्रकृति के साथ हो जाता है
सब कुछ वैसा ही
नाक, मुँह, कान, बाल
ग्लास काँच का, लोहे का पाईप
बिस्तर, यहाँ तक कि गीज़र भी
(कैसे अपने रंग में रंग लेता है मौसम)
.................................................
मुँह से मगर निकलती है
भाप
कहती है फुसफुसाकर
- करती है आश्वस्त – बाहर से हो गए हो
मौसम की तरह सर्द
मगर मन तो मणिकर्ण है
गंधक के उबलते पानी की तरह
सच है
तन मनाली हो गया हो भले
मन तो शाश्वत मणिकर्ण है
प्रकृति के साथ हो जाता है
सब कुछ वैसा ही
नाक, मुँह, कान, बाल
ग्लास काँच का, लोहे का पाईप
बिस्तर, यहाँ तक कि गीज़र भी
(कैसे अपने रंग में रंग लेता है मौसम)
.................................................
मुँह से मगर निकलती है
भाप
कहती है फुसफुसाकर
- करती है आश्वस्त – बाहर से हो गए हो
मौसम की तरह सर्द
मगर मन तो मणिकर्ण है
गंधक के उबलते पानी की तरह
सच है
तन मनाली हो गया हो भले
मन तो शाश्वत मणिकर्ण है
Monday, February 28, 2011
Sunday, January 9, 2011
चाहता मन
न बदले अधिकार में प्यार मेरा
बस तुम्हें देखता, सुनता, महसूसता रहूँ
कभी न सोचूँ
तुम देखो, सुनो, महसूसो मुझे
चाहता मन
देना ही आता रहे मुझे
कभी न सोचूँ मुझे मिला नहीं क्यों
बसी रहे समर्पण की चाह मन में
बनी रहे आकुलता ऐसी ही
जब तुम्हें देखूँ नशा-सा हो जाए
चाहता मन
जब भी आए, दिल काम में आए
कभी न दिमाग
मेरे-तुम्हारे दरमियां आए
चाहता मन
न बदले अधिकार में प्यार मेरा
तुम्हें चाहना मेरे लिए जीवन जीना है
Saturday, January 8, 2011
अजीब विडंबना है...
हज़ारों हज़ार बरस से चमक रहा है सूर्य
तुम्हारी संवेदना की ओजोन परत अब भेद पाया है
अब तुम्हें सूरज की रोशनी
तेज से तेजतर लगने लगी है
अब नोटिस किया है तुमने सूर्य को
जबकि बेचारा सूर्य
अब मद्धम हो चला है
ठंडी हो चली है, उसकी आग
अपने शिखर से उतर चला है, वह
अजीब विडंबना है,
उसके बुढ़ापे में तुमने उसे समझा है
तुम्हारी समझ में समा न सका
जब वह अपने यौवन पर था
अजीब विडंबना है
जाने कब से लिख रहा हूँ मैं
और तुम्हारे मन को अब छू पाया हूँ
अब तुम्हें मेरा लिखा
अच्छा और गहन
समझ आने लगा है
अब तुम्हें लगा है कि
एक युवा अपनी पहचान बना रहा है
मगर यह मेरा यौवनकाल नहीं
मेरा प्रौढ़ि-प्राप्तिकाल है
तुम हँसोगे मेरी पच्चीस की उम्र जानकर
मगर क्या करूँ
मेरे लेखन ने जो यात्रा तय की है
उसमें दिन-रात से महत्वपूर्ण मेरे अनुभव थे
जो मुझे परिपक्व करते रहे
अजीब विडंबना है
मैं अब समाजोन्मुख हो चला हूँ
और अब मुझे तुम ‘रोमेंटिक’ समझ रहे हो
तुम्हारी संवेदना की ओजोन परत अब भेद पाया है
अब तुम्हें सूरज की रोशनी
तेज से तेजतर लगने लगी है
अब नोटिस किया है तुमने सूर्य को
जबकि बेचारा सूर्य
अब मद्धम हो चला है
ठंडी हो चली है, उसकी आग
अपने शिखर से उतर चला है, वह
अजीब विडंबना है,
उसके बुढ़ापे में तुमने उसे समझा है
तुम्हारी समझ में समा न सका
जब वह अपने यौवन पर था
अजीब विडंबना है
जाने कब से लिख रहा हूँ मैं
और तुम्हारे मन को अब छू पाया हूँ
अब तुम्हें मेरा लिखा
अच्छा और गहन
समझ आने लगा है
अब तुम्हें लगा है कि
एक युवा अपनी पहचान बना रहा है
मगर यह मेरा यौवनकाल नहीं
मेरा प्रौढ़ि-प्राप्तिकाल है
तुम हँसोगे मेरी पच्चीस की उम्र जानकर
मगर क्या करूँ
मेरे लेखन ने जो यात्रा तय की है
उसमें दिन-रात से महत्वपूर्ण मेरे अनुभव थे
जो मुझे परिपक्व करते रहे
अजीब विडंबना है
मैं अब समाजोन्मुख हो चला हूँ
और अब मुझे तुम ‘रोमेंटिक’ समझ रहे हो
Thursday, January 6, 2011
आग एक ही है
सर्दी उदास करती है, धूप उदास करती है
इफरात किसी चीज की, हर शै उदास करती है
मुहब्बत में कोई पागल, कोई अँधा, कोई दीवाना है
बेवफाई भी तो ऐसे ही, बदहवास करती है
कोई मरता है प्यास से, कोई पीकर मरता है
लत मयकशी की हर तरह, जवानी बर्बाद करती है
कोई संग तराशता है, कोई नग्में सुनाता है
आग एक ही है, सौ रंग ईजाद करती है
तुझको चाहता हूँ, तो भी न चाहूँ तब भी
दुनिया समझ लेती है, बेलिबास करती है
इक लौ-सी लपकती रहती है भीतर
करीब जाने पर पूरा हिसाब करती है
इफरात किसी चीज की, हर शै उदास करती है
मुहब्बत में कोई पागल, कोई अँधा, कोई दीवाना है
बेवफाई भी तो ऐसे ही, बदहवास करती है
कोई मरता है प्यास से, कोई पीकर मरता है
लत मयकशी की हर तरह, जवानी बर्बाद करती है
कोई संग तराशता है, कोई नग्में सुनाता है
आग एक ही है, सौ रंग ईजाद करती है
तुझको चाहता हूँ, तो भी न चाहूँ तब भी
दुनिया समझ लेती है, बेलिबास करती है
इक लौ-सी लपकती रहती है भीतर
करीब जाने पर पूरा हिसाब करती है
Wednesday, January 5, 2011
रोमेंटिक कम्युनिस्ट
मैं तुम्हें पसंद करती हूँ
इसलिए नहीं कि
तुम आर्दशवादी हो
या कि व्यक्तित्ववान हो
या हर चीज को परखते हो तुम
अपने नजरिए से
बल्कि इसलिए कि
तुम एकदम जुदा हो
आम आदर्शवादियों से
तुम्हारे पास है न गंभीर चेहरा
न भारी-भरकम बातें
न उत्तरदायित्व का युग-बोझ
न व्यवहार में कहीं खटकती शुष्कता या उथलापन
तुम एक किताब हो
जो हर पृष्ठ पढ़ने पर ही समझ आती है
केवल प्रस्तावना या उपसंहार पढ़कर नहीं
अपनी वैचारिक उलझनों के बीच भी
कब तुम रोमेंटिक हो जाओगे
कोई कह नहीं सकता
और कब मेरे काँधे पर सिर रखकर
युगीन समस्याओं पर सोच उठोगे
कई बार मुझे भी मालूम नहीं पड़ता
सच कहूँ, तुम्हारी इन्हीं संभावनाओं
और अनिश्चितताओं से प्यार है मुझे
और मैं निश्चिंत हूँ यह जानते हुए भी
कि मेरे कंधे पर टिका हुआ तुम्हारा माथा
सुलझा रहा है, कोई साहित्यिक समस्या
क्योंकि मैं जानती हूँ
लिखते, पढ़ते, सोचते
या कि बाजार से गुजरते भी
मैं तुम्हारे आसपास ही होती हूँ ( औऱ जैसा कि तुम अक्सर कहते हो)
आसपास और अंदर...
इसलिए नहीं कि
तुम आर्दशवादी हो
या कि व्यक्तित्ववान हो
या हर चीज को परखते हो तुम
अपने नजरिए से
बल्कि इसलिए कि
तुम एकदम जुदा हो
आम आदर्शवादियों से
तुम्हारे पास है न गंभीर चेहरा
न भारी-भरकम बातें
न उत्तरदायित्व का युग-बोझ
न व्यवहार में कहीं खटकती शुष्कता या उथलापन
तुम एक किताब हो
जो हर पृष्ठ पढ़ने पर ही समझ आती है
केवल प्रस्तावना या उपसंहार पढ़कर नहीं
अपनी वैचारिक उलझनों के बीच भी
कब तुम रोमेंटिक हो जाओगे
कोई कह नहीं सकता
और कब मेरे काँधे पर सिर रखकर
युगीन समस्याओं पर सोच उठोगे
कई बार मुझे भी मालूम नहीं पड़ता
सच कहूँ, तुम्हारी इन्हीं संभावनाओं
और अनिश्चितताओं से प्यार है मुझे
और मैं निश्चिंत हूँ यह जानते हुए भी
कि मेरे कंधे पर टिका हुआ तुम्हारा माथा
सुलझा रहा है, कोई साहित्यिक समस्या
क्योंकि मैं जानती हूँ
लिखते, पढ़ते, सोचते
या कि बाजार से गुजरते भी
मैं तुम्हारे आसपास ही होती हूँ ( औऱ जैसा कि तुम अक्सर कहते हो)
आसपास और अंदर...
Tuesday, January 4, 2011
रचनाः चार प्रक्रियाएँ
1 धीरे-धीरे
छूटती है केंचुल
और सर्प पाता है
पुनः दृष्टि
2
धीरे-धीरे
जमती है पर्तें
और निर्मित होता है
मोती सीप में
3
धीरे-धीरे
बुनती है जाल मकड़ी
और पकड़ लेती है शिकार
4
धीरे-धीरे
चढ़ता है नशा
और हरेक भूल जाता है दर्द को।
छूटती है केंचुल
और सर्प पाता है
पुनः दृष्टि
2
धीरे-धीरे
जमती है पर्तें
और निर्मित होता है
मोती सीप में
3
धीरे-धीरे
बुनती है जाल मकड़ी
और पकड़ लेती है शिकार
4
धीरे-धीरे
चढ़ता है नशा
और हरेक भूल जाता है दर्द को।
Monday, January 3, 2011
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मुझको अर्घ्य में जल नहीं
अग्नि रूचती है
सूर्य, क्या तुम अपनी देय को
पुनः स्वीकारोगे
कष्ट, कष्ट, कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल धार-सा ही
मगर उमड़ा हूँ
जल, जल, जल
सिंधु
क्या तुम अपनी विवशता़
पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
भूल-भूलैया वाली सुरंगों
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी भीतर कोई रत्न पाए
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष, संघर्ष, संघर्ष
जीवन क्या तुम अपनी हठ को
पुनः स्वीकारोगे

अग्नि रूचती है
सूर्य, क्या तुम अपनी देय को
पुनः स्वीकारोगे
कष्ट, कष्ट, कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल धार-सा ही
मगर उमड़ा हूँ
जल, जल, जल
सिंधु
क्या तुम अपनी विवशता़
पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
भूल-भूलैया वाली सुरंगों
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी भीतर कोई रत्न पाए
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष, संघर्ष, संघर्ष
जीवन क्या तुम अपनी हठ को
पुनः स्वीकारोगे
Sunday, January 2, 2011
इस साल कुछ नया सीखूँगा
कम्प्यूटर सीखा,
इंटरनेट सीखा
हिंदी की-बोर्ड ‘इंस्क्रिप्ट’ सीखा
ब्लॉग बनाया,
माइक्रो ब्लॉगिंग भी की
वेबसाइट भी कर ली डिजाइन
स्केनिंग, फोटो एडिटिंग सीखी
सब तकनीकी चीजें कर डाली
मगर,
सिंथसाइजर नहीं सीख पाया
कार फिर से चलाने का
माद्दा नहीं जुटा पाया,
अंग्रेजी फर्राटेदार नहीं बोल पाया
स्पेनिश, जर्मन, फ्रेंच के दो-चार ही
शब्दों से रू-ब-रू हो पाया...
......................................
उपलब्धियाँ, लिख दी हैं
समुद्री किनारे की रेत पे
और दस्तावेज बना ली हैं
कमियाँ, असफलता हर...
..................................
इन्हें ध्यान रखूँगा, और
इस साल कुछ नया सीखूँगा
इंटरनेट सीखा
हिंदी की-बोर्ड ‘इंस्क्रिप्ट’ सीखा
ब्लॉग बनाया,
माइक्रो ब्लॉगिंग भी की
वेबसाइट भी कर ली डिजाइन
स्केनिंग, फोटो एडिटिंग सीखी
सब तकनीकी चीजें कर डाली
मगर,
सिंथसाइजर नहीं सीख पाया
कार फिर से चलाने का
माद्दा नहीं जुटा पाया,
अंग्रेजी फर्राटेदार नहीं बोल पाया
स्पेनिश, जर्मन, फ्रेंच के दो-चार ही
शब्दों से रू-ब-रू हो पाया...
......................................
उपलब्धियाँ, लिख दी हैं
समुद्री किनारे की रेत पे
और दस्तावेज बना ली हैं
कमियाँ, असफलता हर...
..................................
इन्हें ध्यान रखूँगा, और
![]() |
| कैप्शन जोड़ें |
Thursday, December 9, 2010
ज़िन्दगी : पाँच कदम
दो कदम तनहा चले
शुरू में
और बाद के दो कदम
भी अकेले
पाँच कदमों की थी जिंदगी
बीच के उस कदम में
एक साए के कदम भी
साथ मेरे चले
शुरू में
और बाद के दो कदम
भी अकेले
पाँच कदमों की थी जिंदगी
बीच के उस कदम में
एक साए के कदम भी
साथ मेरे चले
Wednesday, December 8, 2010
स्त्री बनाम पेड़
वृक्ष-सी होती है स्त्री
उगती है किसी आँगन
छाया किसी और आँगन देती है
ताड़-सी बढ़ना
फलो-फूलो
ममता भरी छाँह
ये सारे
रूपक, उपमाएँ
किसी और का नहीं
स्मरण कराते हैं स्त्री का ही
औऱ स्त्री भी निभाती है
इन सभी को बखूबी
तभी तो ताड़-सी बढ़ती अपनी बढ़त को
फुनगी कटवाकर
चुपचाप अपनी
तमाम शिखरीय संभावनाओँ को
कटवा कर
आशीर्वाद पाती है
फलो-फूलो
और कभी इच्छा, कभी अनिच्छा
से फूलती है, फलती है
तानों-उलाहनों के पत्थर मारे जाने पर भी
देती है फल मीठे
फूलती है चंदन-सुवासित गंध-सी
जिसकी सुगंध घर-भर अनुभव करता है
धीरे-धीरे अपनी जड़ें
गहरी जमाकर
वह बन जाती है वट (दादी, नानी, अम्माँ)
और देती है ममता भरी छाँह
और फिर अपनी शिराओं को
लटकाकर जमीन पर भेजती हैं
ताकि फूटे फिर नई कोंपलें
और फिर किसी दिन (हाँलाकि यह नहीं है सुखद)
कटवा कर उसे
बनवा ली जाती है कुर्सियाँ, टेबलें और घर के दरवाजे की चौखटें
स्त्री पुनः आँख, गोद, बाँहें बन जाती है....
इन चौखटों, कुर्सियों, टेबलों में
उगती है किसी आँगन
छाया किसी और आँगन देती है
ताड़-सी बढ़ना
फलो-फूलो
ममता भरी छाँह
ये सारे
रूपक, उपमाएँ
किसी और का नहीं
स्मरण कराते हैं स्त्री का ही
औऱ स्त्री भी निभाती है
इन सभी को बखूबी
तभी तो ताड़-सी बढ़ती अपनी बढ़त को
फुनगी कटवाकर
चुपचाप अपनी
तमाम शिखरीय संभावनाओँ को
कटवा कर
आशीर्वाद पाती है
फलो-फूलो
और कभी इच्छा, कभी अनिच्छा
से फूलती है, फलती है
तानों-उलाहनों के पत्थर मारे जाने पर भी
देती है फल मीठे
फूलती है चंदन-सुवासित गंध-सी
जिसकी सुगंध घर-भर अनुभव करता है
धीरे-धीरे अपनी जड़ें
गहरी जमाकर
वह बन जाती है वट (दादी, नानी, अम्माँ)
और देती है ममता भरी छाँह
और फिर अपनी शिराओं को
लटकाकर जमीन पर भेजती हैं
ताकि फूटे फिर नई कोंपलें
और फिर किसी दिन (हाँलाकि यह नहीं है सुखद)
कटवा कर उसे
बनवा ली जाती है कुर्सियाँ, टेबलें और घर के दरवाजे की चौखटें
स्त्री पुनः आँख, गोद, बाँहें बन जाती है....
इन चौखटों, कुर्सियों, टेबलों में
Monday, December 6, 2010
कब तक यह अंतिम लड़ाई
बस यह अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद फिर
किंतु इस सुख के पहले
त्रास कितना
कितना दुख
संघर्ष कितना
जरा बताना
जानता हूँ
बस यही अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद फिर
फिर जैसा भी बचूँ
मैं तुम्हारा
क्षत सही, विक्षत सही
घायल और प्यासा सही
चाहूँगा बस
एक मीठी-सी चुभन
और थोड़ा स्नेहोपचार
माथे पर गर्म साँसें और
सीने के करीब प्यार
जानता हूँ बस ये अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद फिर
किंतु
कब तक यह अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद कब
और सुख की गोद फिर
किंतु इस सुख के पहले
त्रास कितना
कितना दुख
संघर्ष कितना
जरा बताना
जानता हूँ
बस यही अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद फिर
फिर जैसा भी बचूँ
मैं तुम्हारा
क्षत सही, विक्षत सही
घायल और प्यासा सही
चाहूँगा बस
एक मीठी-सी चुभन
और थोड़ा स्नेहोपचार
माथे पर गर्म साँसें और
सीने के करीब प्यार
जानता हूँ बस ये अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद फिर
किंतु
कब तक यह अंतिम लड़ाई
और सुख की गोद कब
Saturday, December 4, 2010
चमक-दमक
यार कमल
तेरी स्निग्धता
आब और मधुकोष
देय तो हैं
उसी पंक की
जिससे
ऊब-उबरकर बाहर आया है तू
जो तेरी नियति है
तेरे अस्तित्व का कारण भी
भुलाना चाहे भी तो कैसे
भुलाएगा उसे तू
तेरी स्निग्धता
आब और मधुकोष
देय तो हैं
उसी पंक की
जिससे
ऊब-उबरकर बाहर आया है तू
जो तेरी नियति है
तेरे अस्तित्व का कारण भी
भुलाना चाहे भी तो कैसे
भुलाएगा उसे तू
Friday, December 3, 2010
जैसे खुशबू छूती है फूल को
मैं हर वक्त
देखना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे तुम पर छाया रहने वाला आसमान देखता है तुम्हें
जैसे तुम्हारे पैरों तले बिछी जमीन देखती है तुम्हें
जैसे तुम्हारे चारों ओर तनी हुई दिशाएँ देखती है तुम्हें
मेरी आँखे देखना चाहती है तुम्हें
हर उस कोण से जैसे
सारी कायनात और
उसका जर्रा-जर्रा देखता है तुम्हें
मैं हर वक्त छूना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे खुशबू छूती है फूल को
जैसे हवा छूती है बदन को
जैसे शरीर छूता है रूह को
जैसे छूती है रोशनी जमीन को
मैं समर्पित होना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे अँधेरा ज्योति-किरण को
जैसे जिस्म मीठी चुभन को
जैसे शाम चंदन-बदन को
जैसे खुशबू किसी चमन को
देखना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे तुम पर छाया रहने वाला आसमान देखता है तुम्हें
जैसे तुम्हारे पैरों तले बिछी जमीन देखती है तुम्हें
जैसे तुम्हारे चारों ओर तनी हुई दिशाएँ देखती है तुम्हें
मेरी आँखे देखना चाहती है तुम्हें
हर उस कोण से जैसे
सारी कायनात और
उसका जर्रा-जर्रा देखता है तुम्हें
मैं हर वक्त छूना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे खुशबू छूती है फूल को
जैसे हवा छूती है बदन को
जैसे शरीर छूता है रूह को
जैसे छूती है रोशनी जमीन को
मैं समर्पित होना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे अँधेरा ज्योति-किरण को
जैसे जिस्म मीठी चुभन को
जैसे शाम चंदन-बदन को
जैसे खुशबू किसी चमन को
Thursday, December 2, 2010
उसकी किताब
न ये कहानी उसकी
न ये बात उसकी
एक झरोखा-सी बन गई है
एक अदद किताब उसकी
एक पात्र पर वो जा बैठी
एक पात्र मैंने चुना
पात्रों की जुबाँ समझते रहें
वो मेरी
मैं बात उसकी
उसकी छुअन, उसकी गंध
इसी में साँसें उसकी
फड़फड़ा रहे हैं वर्क हवा से
या कँपकँपा रही है जुबाँ उसकी
गाढ़ा कर दिया है कलम से
बहुत-से अल्फ़ाज को मैंने
मेरे खयालों की हमराज
बन गई है किताब उसकी
न ये बात उसकी
एक झरोखा-सी बन गई है
एक अदद किताब उसकी
एक पात्र पर वो जा बैठी
एक पात्र मैंने चुना
पात्रों की जुबाँ समझते रहें
वो मेरी
मैं बात उसकी
उसकी छुअन, उसकी गंध
इसी में साँसें उसकी
फड़फड़ा रहे हैं वर्क हवा से
या कँपकँपा रही है जुबाँ उसकी
गाढ़ा कर दिया है कलम से
बहुत-से अल्फ़ाज को मैंने
मेरे खयालों की हमराज
बन गई है किताब उसकी
Wednesday, December 1, 2010
चाँद को गुनगुनाते मैंने सुना है

हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
सुरमई रातों में जब बादल गहराएँ
बदली के आँचल से जब तारे छिप जाएँ
कभी-कभी हो जब
दीदार चाँद का
तब मीठा-सा मैंने कोई गीत सुना है
हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
फीकी-फीकी हो चाँदनी जब
ख़ामोश हो फ़िजा सारी
दर्द की एक बस्ती को
आहिस्ता-आहिस्ता मैंने सुना है
हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
महकी-महकी हो जब रातें
गा रही हो महफ़िल सारी
आकाश के कोने में चाँद को
सिसक-सिसक कर गज़ल गाते मैंने सुना है
तुमने चाँद को कभी
गुनगुनाते सुना है
मैंने सुना है
Wednesday, November 17, 2010
, ज़िन्दगी मुझ पे मेहरबान हो गई .
नवंबर में ऐसी बारिश ,सावन-सी शाम हो गई
ख़ास हो चली थी आदत लिखने की,आम हो गई .

वो कहीं भी रहे , आबाद हूँ, दिल में बसा रहता है
एक गली का क्या, गर गुमशुदा-गुमनाम हो गई .
उसका कद ही नहीं,कदे-सुखन भी है मेरे बराबर
वो मेरा दोस्त है, ज़िन्दगी मुझ पे मेहरबान हो गई .
चल पड़ा है मेरी ओर वो, मुश्किलों मुकम्मल देख लो
बाद न कहना, हम न थे इसी से मंज़िल आसां हो गई .
ये दुनियावी झमेले,दुश्वारियां औ गमे-दुनिया के दरमियां
तुम मिले तो लगा, नेमतों से अब मेरी पहचान हो गई .
ख़ास हो चली थी आदत लिखने की,आम हो गई .
वो कहीं भी रहे , आबाद हूँ, दिल में बसा रहता है
एक गली का क्या, गर गुमशुदा-गुमनाम हो गई .
उसका कद ही नहीं,कदे-सुखन भी है मेरे बराबर
वो मेरा दोस्त है, ज़िन्दगी मुझ पे मेहरबान हो गई .
चल पड़ा है मेरी ओर वो, मुश्किलों मुकम्मल देख लो
बाद न कहना, हम न थे इसी से मंज़िल आसां हो गई .
ये दुनियावी झमेले,दुश्वारियां औ गमे-दुनिया के दरमियां
तुम मिले तो लगा, नेमतों से अब मेरी पहचान हो गई .
Thursday, November 11, 2010
सोई हुई तुम
ये बोझिल पलकें
थका हुआ जिस्म ये पसीना
जैसे झर जाती है पाँखुरियाँ
जैसे राख हो जाती है धूपबत्ती
देर तक खुशबू देकर
देर तक महक कर
...............................
कोई इसे जगाये क्यूँकर
..................................
थका हुआ जिस्म ये पसीना
जैसे झर जाती है पाँखुरियाँ
जैसे राख हो जाती है धूपबत्ती
देर तक खुशबू देकर
देर तक महक कर
...............................
कोई इसे जगाये क्यूँकर
..................................
Wednesday, November 10, 2010
ब्लैक होल
मेरी आँखें
मेरी साँसें
मेरे होंठ
मेरी बाँहें
मेरा रोम-रोम
शायद एक अंधा कुआँ है
या है शायद एक
कृष्ण विवर
जो तुम्हें
हरपल
हर लम्हा
देखकर
छूकर
पीकर
समेटकर
जी-जीकर भी
भरता ही नहीं
मेरी साँसें
मेरे होंठ
मेरी बाँहें
मेरा रोम-रोम
शायद एक अंधा कुआँ है
या है शायद एक
कृष्ण विवर
जो तुम्हें
हरपल
हर लम्हा
देखकर
छूकर
पीकर
समेटकर
जी-जीकर भी
भरता ही नहीं
Monday, November 8, 2010
तारीफ करता हुआ लड़का
मुझे खुद में इतना कभी मत मिलाओ
कि
मेरी तारीफ
प्रशंसाओं पर तुम
खुश न होओ
भर-भर न जाओ
मुझे बहलाने के लिए मत कहो
‘हाँ, ठीक है ना’
या कि बस इतना भी न कहो
‘बहुत पागल हो तुम’
हाँ मैं पागल हूँ मगर
जो तारीफ मैं तुम्हारी करता हूँ
यकीन मानो
तुम उसके लायक हो
मेरे द्वारा
तुम्हारी की हुई तारीफ
सचमुच तुम्हारी व्यक्तिगत उपलब्धि है
मेरा प्यार नहीं
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
मगर
प्रशंसा
अलहदा चीज है
यकीन मानो
यह प्रत्युत्पन्न है
मुझे खुद में शामिल समझो मगर
इतना ही कि
तुम्हारी आँखों
होंठों
बालों
रंग की तारीफ करता हुआ
यह लड़का
तुम्हारी नहीं
इन सुंदर चीजों की
तारीफ कर रहा है
जो सचमुच सुंदर है
कि
मेरी तारीफ
प्रशंसाओं पर तुम
खुश न होओ
भर-भर न जाओ
मुझे बहलाने के लिए मत कहो
‘हाँ, ठीक है ना’
या कि बस इतना भी न कहो
‘बहुत पागल हो तुम’
हाँ मैं पागल हूँ मगर
जो तारीफ मैं तुम्हारी करता हूँ
यकीन मानो
तुम उसके लायक हो
मेरे द्वारा
तुम्हारी की हुई तारीफ
सचमुच तुम्हारी व्यक्तिगत उपलब्धि है
मेरा प्यार नहीं
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
मगर
प्रशंसा
अलहदा चीज है
यकीन मानो
यह प्रत्युत्पन्न है
मुझे खुद में शामिल समझो मगर
इतना ही कि
तुम्हारी आँखों
होंठों
बालों
रंग की तारीफ करता हुआ
यह लड़का
तुम्हारी नहीं
इन सुंदर चीजों की
तारीफ कर रहा है
जो सचमुच सुंदर है
तुझको तो ख़बर नही मगर,एक सादा-लौह इंसान को....*
तुम्हारा नाम नहीं ले सकता
बस तुम्हारा
बाकी सब नाम
महज शब्द हैं मेरे लिए
मगर
रूप
रस
गंध और
ध्वनि
प्रकटती है बस इन्हीं शब्दों से
जो तुम्हारा नाम है
बाकी सब नाम
महज यथार्थ है मेरे लिए
महज क्षण, क्षणिक मगर
भूत
भविष्य
वर्तमान
स्मृति, कल्पनाएँ और दृष्टि
जुड़ती है बस उसी नाम से
जो तुम्हारा है
बाकी सब नाम
महज पढ़ती है आँखें
मगर
आँख
कान
नाक
त्वचा
और रोम-रोम
पुलकता है बस उसी नाम से
जो तुम्हारा है
..........
देख लो !
प्यार ने मुझे परंपरागत
लजीली भारतीय स्त्री बना दिया
*( साहिर लुधियानवी से साभार )
बस तुम्हारा
बाकी सब नाम
महज शब्द हैं मेरे लिए
मगर
रूप
रस
गंध और
ध्वनि
प्रकटती है बस इन्हीं शब्दों से
जो तुम्हारा नाम है
बाकी सब नाम
महज यथार्थ है मेरे लिए
महज क्षण, क्षणिक मगर
भूत
भविष्य
वर्तमान
स्मृति, कल्पनाएँ और दृष्टि
जुड़ती है बस उसी नाम से
जो तुम्हारा है
बाकी सब नाम
महज पढ़ती है आँखें
मगर
आँख
कान
नाक
त्वचा
और रोम-रोम
पुलकता है बस उसी नाम से
जो तुम्हारा है
..........
देख लो !
प्यार ने मुझे परंपरागत
लजीली भारतीय स्त्री बना दिया
*( साहिर लुधियानवी से साभार )
Saturday, November 6, 2010
तर्क, तर्क, तर्क.....
क्यों जकड़ लिया जाता हूँ
मैं
एक पगलाए अहम में
नहीं छू पाती तब
मुझे
जीवन की सहज बातें
प्यार का औदात्य
तुम्हारी देह गंध
बस मैं होकर रह जाता हूँ
एक दिमाग
स्वचालित और आत्मकेंद्रीत
तर्क, तर्क, तर्क
पगलाए पर बुद्धि पगे
(या मात्र आवेश से सने, आवेग से लदे)
तुम्हें झुकाने को
(या शायद स्वयं जीत जाने को)
आतुर तर्क
कहाँ चला जाता है
मेरा बड़ापन
त्याग, समर्पण नशा
और सब पर आकाश की तरह
छा सकने वाला प्यार
..................
................
और यकायक
मुझे छूती है
तुम्हारी खुशबू
मुझे घेर लेती है
तुम्हारी थरथराती पलकें
खींचते हैं तुम्हारे दाँत और मसूड़े
और लो मैं फिर बन जाता हूँ वैसा
जिसे कह सको तुम
‘बहुत पागल हो’
मैं
एक पगलाए अहम में
नहीं छू पाती तब
मुझे
जीवन की सहज बातें
प्यार का औदात्य
तुम्हारी देह गंध
बस मैं होकर रह जाता हूँ
एक दिमाग
स्वचालित और आत्मकेंद्रीत
तर्क, तर्क, तर्क
पगलाए पर बुद्धि पगे
(या मात्र आवेश से सने, आवेग से लदे)
तुम्हें झुकाने को
(या शायद स्वयं जीत जाने को)
आतुर तर्क
कहाँ चला जाता है
मेरा बड़ापन
त्याग, समर्पण नशा
और सब पर आकाश की तरह
छा सकने वाला प्यार
..................
................
और यकायक
मुझे छूती है
तुम्हारी खुशबू
मुझे घेर लेती है
तुम्हारी थरथराती पलकें
खींचते हैं तुम्हारे दाँत और मसूड़े
और लो मैं फिर बन जाता हूँ वैसा
जिसे कह सको तुम
‘बहुत पागल हो’
झर जाती हैं पाँखुरियाँ
बहुत उदासी में
झर जाता है सुख
न जाने कब
जैसे झर जाती हैं
पाँखुरियाँ
गुलदान में रखे
फूलों से
....निःशब्द.......
झर जाता है सुख
न जाने कब
जैसे झर जाती हैं
पाँखुरियाँ
गुलदान में रखे
फूलों से
....निःशब्द.......
Friday, November 5, 2010
देखता हूँ तुम्हारी आवाज़
मैं देखता हूँ तुम्हारी आवाज़ को
तुम्हारे होंठ
खुलते हैं, फड़फड़ाते हैं
चौड़े होते हैं, सिकुड़ते हैं
मिलते हैं, खिलते हैं
आगे को आते हैं, पीछे जाते हैं
दाँतों से टकराते हैं
जुबाँ के उपर-नीचे
हिचकोले खाते हैं
मैं तुम्हें देख रहा हूँ बस
तुम बोल रही हो
शब्द-दर-शब्द
शायद इनका कोई अर्थ भी होगा
मगर मैं सुन रहा हूँ
वो अर्थातीत सौंदर्य
जो तुम्हारे होंठ
फूल से खिलकर
बरसा रहे हैं
प्रतिपल-प्रतिक्षण
और लो
तुम नाराज हो रही हो
कि मैं तुम्हारी बात नहीं सुन रहा हूँ
हे भगवान ! (यदि तुम हो तो)
इसे कुछ समझाओ
तुम्हारे होंठ
खुलते हैं, फड़फड़ाते हैं
चौड़े होते हैं, सिकुड़ते हैं
मिलते हैं, खिलते हैं
आगे को आते हैं, पीछे जाते हैं
दाँतों से टकराते हैं
जुबाँ के उपर-नीचे
हिचकोले खाते हैं
मैं तुम्हें देख रहा हूँ बस
तुम बोल रही हो
शब्द-दर-शब्द
शायद इनका कोई अर्थ भी होगा
मगर मैं सुन रहा हूँ
वो अर्थातीत सौंदर्य
जो तुम्हारे होंठ
फूल से खिलकर
बरसा रहे हैं
प्रतिपल-प्रतिक्षण
और लो
तुम नाराज हो रही हो
कि मैं तुम्हारी बात नहीं सुन रहा हूँ
हे भगवान ! (यदि तुम हो तो)
इसे कुछ समझाओ
Thursday, November 4, 2010
इन दिनों.....
तुम्हारे होंठों से
झरते हैं शब्द
टप-टप-टप
महकती है फिज़ा लकलक
मैं साँस-साँस में
महसूस करता हूँ
गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और कनेर
और न जाने क्या - कुछ
जो तुम्हारी साँसों से
महकता है
ढेर-ढेर
झरते हैं शब्द
टप-टप-टप
महकती है फिज़ा लकलक
मैं साँस-साँस में
महसूस करता हूँ
गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और कनेर
और न जाने क्या - कुछ
जो तुम्हारी साँसों से
महकता है
ढेर-ढेर
Tuesday, November 2, 2010
तरीके
जीना चाहती हो तुम भी
हरपल, हर क्षण
हर लम्हा मेरे साथ
मगर अंतर है
हम दोनों की जीवन-शैलियों में
तुम मेरे साथ जीना चाहती हो
मैं तुम्हारे पास
हर घड़ी, हर पल, हर लम्हा
और ये अंतर मामूली नहीं
इसके दोनों ओर खड़े हैं
दो जीवन-दर्शन
दो प्रकृति
दो इरादे
दो सुख
(और)
मगर एक लक्ष्य...
.....प्यार...
हरपल, हर क्षण
हर लम्हा मेरे साथ
मगर अंतर है
हम दोनों की जीवन-शैलियों में
तुम मेरे साथ जीना चाहती हो
मैं तुम्हारे पास
हर घड़ी, हर पल, हर लम्हा
और ये अंतर मामूली नहीं
इसके दोनों ओर खड़े हैं
दो जीवन-दर्शन
दो प्रकृति
दो इरादे
दो सुख
(और)
मगर एक लक्ष्य...
.....प्यार...
Monday, November 1, 2010
डॉन क्विग्जोट
खुद को
इतिहास में
देखने के लिए
तुमने क्या नहीं किया
चेहरे बदले
कद को तराशा
कभी इधर, कभी उधर
कभी तटस्थ हैं हम
दुनिया को बतलाया
कभी हँसे, कभी रोए
कभी हँसाया-रूलाया
गोयाकि हरसंभव कोशिश की
मगर बड़ा जालिम
निकला इतिहास
तुम्हारा नाम उसमें
शामिल किया भी तो
विदूषकों की सूची में
(खैर गलती किससे नहीं होती,
अभी अगला संस्करण भी तो निकलेगा इतिहास का)
इतिहास में
देखने के लिए
तुमने क्या नहीं किया
चेहरे बदले
कद को तराशा
कभी इधर, कभी उधर
कभी तटस्थ हैं हम
दुनिया को बतलाया
कभी हँसे, कभी रोए
कभी हँसाया-रूलाया
गोयाकि हरसंभव कोशिश की
मगर बड़ा जालिम
निकला इतिहास
तुम्हारा नाम उसमें
शामिल किया भी तो
विदूषकों की सूची में
(खैर गलती किससे नहीं होती,
अभी अगला संस्करण भी तो निकलेगा इतिहास का)
Monday, October 25, 2010
यूँ होता तो क्या बुरा होता!
देर तक साथ-साथ
जागते-पढ़ते-लिखते
उठते सुबह (!)
आठ साढ़े आठ, कभी नौ साढ़े नौ बजे
पीते चाय चुस्कियाँ लेकर
अखबार देखते
तुम बनाती चपाती सब्ज़ी
पराठे, अचार का नाश्ता करती
सद्य स्नाता निकलती
अपने बालों से
झरती बूँदें लिए
मैं थोड़ी-सी गार्डनिंग कर आता
या टिफिन भरने में तुम्हारा हाथ बँटाता
ठंडे पानी से नहाता
टाई कौन-सी पहनूँ
पूछता हुआ शर्ट के बटन लगाता
तुम्हें छोड़ता हुआ
तुम्हारे दफ्तर
मैं भी काम पर चला जाता
दो-चार पीरियड पढ़ाते न पढ़ाते
चार का वक्फ़ा हो जाता
तुम्हें लेता हुआ
घर आता
(बेशक, थोड़ी देर रास्ते में रूककर
फल खरीदने की तुम्हारी आदत पर थोड़ा झुँझलाता
मगर चुपचाप नीचे उतरकर तुम्हारे पास आ जाता)
शाम हसीन होती हमारी
दिन भर की बातों पर गप लगाते
तुम्हारे-मेरे साथ
काम करने वालों की मिमिक्री बनाते
चाय-कॉफी थोड़ा ठंडा-गर्म हो जाता
फिर दूर तक निकलते
हम इवनिंग वॉक पर
लाते खरीदकर
नर्सरी से मौसमी फूल
फल के पौधे
कुछ जमीन पर
बाकी ग़मलों में
तुम्हारे हाथ से उन्हें लगवाता
शाम की एक सब्जी मैं बनाता
सलाद तुमसे कटवाता
तीसरी रोटी खाते-न-खाते
तुम्हें बुलाता
तुम्हारे लिए थोड़ी टेढ़ी ही सही
गरम रोटी मैं बनाता
डिनर करते हुए देखते
टीवी में खबरें
बहस दुनिया भर की
कहानी घर-घर की
कभी फिल्म कभी गेम-शो
कभी म्यूज़िक, डांस का प्रोग्राम कभी
रिमोट हमेशा
तुम्हें पकड़ाता
रविवार...
होता सचमुच छुट्टी का दिन
पूरी छुट्टी तुम्हें लेकर मैं मनाता
लाँग ड्राइव पर निकलते कभी हम
कभी फिल्म का कार्यक्रम बनाते
घूमते देर तलक मॉल में
फिर किसी अच्छी-सी
होटल में डिनर कराता (कैंडल लाइट होती, बड़ा मज़ा आता)
लौटते देर रातों में हम घर को
जूही चमेली की सुगंध से
तब तक लॉन महक जाता
तुम लगाती गज़लें पुरानी या क्लासिकल
मैं इंस्ट्रूमेंटल
अपनी गोद में तुम्हें लेटाया
मैं गुनगुनाता (अक्सर होता इसका उल्टा भी,
तुम्हारी गुनगुनाहट पर मैं कान लगाता)
...................................
जीवन फूल-सा होता
महकता-गमकता-खिलता
बस चुटकियों में निकल जाता
मगर यूँ हो ना सका
मैं तुम्हारे
तुम मेरे इंतजार में
देर-देर तक
करते है काम अलग-अलग
जाते हैं अलग-अलग जगह
अलग-अलग समय
सुबह का नाश्ता
दिन का खाना
अलग-अलग करते हैं
जैसे लिख दिया है इंतजार
और विरह
स्थायी भाव की तरह
किसी ने नसीब में
लम्हा-लम्हा, कतरा-कतरा हम जीते हैं
साथ-साथ हैं
मगर कहाँ साथ-साथ रहते हैं?
कहाँ एक दूसरे के साथ जीते हैं?
(यूँ कहना भी क्या ग़लत है कि दूरियों में
तिल-तिलकर हम थोड़ा-थोड़ा रोज मरते हैं)
जागते-पढ़ते-लिखते
उठते सुबह (!)
आठ साढ़े आठ, कभी नौ साढ़े नौ बजे
पीते चाय चुस्कियाँ लेकर
अखबार देखते
तुम बनाती चपाती सब्ज़ी
पराठे, अचार का नाश्ता करती
सद्य स्नाता निकलती
अपने बालों से
झरती बूँदें लिए
मैं थोड़ी-सी गार्डनिंग कर आता
या टिफिन भरने में तुम्हारा हाथ बँटाता
ठंडे पानी से नहाता
टाई कौन-सी पहनूँ
पूछता हुआ शर्ट के बटन लगाता
तुम्हें छोड़ता हुआ
तुम्हारे दफ्तर
मैं भी काम पर चला जाता
दो-चार पीरियड पढ़ाते न पढ़ाते
चार का वक्फ़ा हो जाता
तुम्हें लेता हुआ
घर आता
(बेशक, थोड़ी देर रास्ते में रूककर
फल खरीदने की तुम्हारी आदत पर थोड़ा झुँझलाता
मगर चुपचाप नीचे उतरकर तुम्हारे पास आ जाता)
शाम हसीन होती हमारी
दिन भर की बातों पर गप लगाते
तुम्हारे-मेरे साथ
काम करने वालों की मिमिक्री बनाते
चाय-कॉफी थोड़ा ठंडा-गर्म हो जाता
फिर दूर तक निकलते
हम इवनिंग वॉक पर
लाते खरीदकर
नर्सरी से मौसमी फूल
फल के पौधे
कुछ जमीन पर
बाकी ग़मलों में
तुम्हारे हाथ से उन्हें लगवाता
शाम की एक सब्जी मैं बनाता
सलाद तुमसे कटवाता
तीसरी रोटी खाते-न-खाते
तुम्हें बुलाता
तुम्हारे लिए थोड़ी टेढ़ी ही सही
गरम रोटी मैं बनाता
डिनर करते हुए देखते
टीवी में खबरें
बहस दुनिया भर की
कहानी घर-घर की
कभी फिल्म कभी गेम-शो
कभी म्यूज़िक, डांस का प्रोग्राम कभी
रिमोट हमेशा
तुम्हें पकड़ाता
रविवार...
होता सचमुच छुट्टी का दिन
पूरी छुट्टी तुम्हें लेकर मैं मनाता
लाँग ड्राइव पर निकलते कभी हम
कभी फिल्म का कार्यक्रम बनाते
घूमते देर तलक मॉल में
फिर किसी अच्छी-सी
होटल में डिनर कराता (कैंडल लाइट होती, बड़ा मज़ा आता)
लौटते देर रातों में हम घर को
जूही चमेली की सुगंध से
तब तक लॉन महक जाता
तुम लगाती गज़लें पुरानी या क्लासिकल
मैं इंस्ट्रूमेंटल
अपनी गोद में तुम्हें लेटाया
मैं गुनगुनाता (अक्सर होता इसका उल्टा भी,
तुम्हारी गुनगुनाहट पर मैं कान लगाता)
...................................
जीवन फूल-सा होता
महकता-गमकता-खिलता
बस चुटकियों में निकल जाता
मगर यूँ हो ना सका
मैं तुम्हारे
तुम मेरे इंतजार में
देर-देर तक
करते है काम अलग-अलग
जाते हैं अलग-अलग जगह
अलग-अलग समय
सुबह का नाश्ता
दिन का खाना
अलग-अलग करते हैं
जैसे लिख दिया है इंतजार
और विरह
स्थायी भाव की तरह
किसी ने नसीब में
लम्हा-लम्हा, कतरा-कतरा हम जीते हैं
साथ-साथ हैं
मगर कहाँ साथ-साथ रहते हैं?
कहाँ एक दूसरे के साथ जीते हैं?
(यूँ कहना भी क्या ग़लत है कि दूरियों में
तिल-तिलकर हम थोड़ा-थोड़ा रोज मरते हैं)
Saturday, October 23, 2010
मैं चैन से रह नहीं सकता
कोई आग़ोश में लेता है
मुझमें जादू-सा जगाता है
मैं आदमी बन बैठा फक़त
मुझे फिर इंसाँ बनाता है
एक शिखर पर पहुँचते ही
तलहटी की राह दिखाता है
मैं चैन से रह नहीं सकता
हरदम याद दिलाता है
मेरी गिरह में हैं कारूँ
मुझे कर्ण बनाता है
राम का कद उतना ही
रावण बढ़ता जाता है
दुनिया अजीब गोरखधंधा
मन उचटा जाता है
मुझमें जादू-सा जगाता है
मैं आदमी बन बैठा फक़त
मुझे फिर इंसाँ बनाता है
एक शिखर पर पहुँचते ही
तलहटी की राह दिखाता है
मैं चैन से रह नहीं सकता
हरदम याद दिलाता है
मेरी गिरह में हैं कारूँ
मुझे कर्ण बनाता है
राम का कद उतना ही
रावण बढ़ता जाता है
दुनिया अजीब गोरखधंधा
मन उचटा जाता है
Thursday, October 21, 2010
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं लम्हें अपने साथ
देर तक जागकर
लिखी नहीं नज़म
बिना दूध की
तुर्श चाय नहीं पी नींबू डालके
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं दिन
तुम्हें याद करके
कुछ सोकर
कुछ खाकर
फिर सोकर
सपनों से सपनीले दिन
सरदर्द होने तक सोए रहने के
खाली कम खर्चीले दिन
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं
बस अपने होने को
सहने-सहते रहने वाले दिन
...................................
मुद्दत हुई
तुम अकेला छोड़कर कहीं नहीं गई
सुनो! क्या अब सचमुच कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी?
देर तक जागकर
लिखी नहीं नज़म
बिना दूध की
तुर्श चाय नहीं पी नींबू डालके
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं दिन
तुम्हें याद करके
कुछ सोकर
कुछ खाकर
फिर सोकर
सपनों से सपनीले दिन
सरदर्द होने तक सोए रहने के
खाली कम खर्चीले दिन
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं
बस अपने होने को
सहने-सहते रहने वाले दिन
...................................
मुद्दत हुई
तुम अकेला छोड़कर कहीं नहीं गई
सुनो! क्या अब सचमुच कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी?
Wednesday, October 20, 2010
transformation
कुछ कविताएँ
मेरे अंदर
कहानियाँ बन जाती हैं
कुछ कहानियाँ
कविता बनकर
मुझमें घर कर जाती है
कुछ कविताएँ
चोला चढ़ाकर
मूर्तियाँ बन जाती हैं
कुछ कहानियाँ
झटक कर अपना सारा स्थूल
महज सुगंध
बन जाती हैं
मेरे अंदर
कहानियाँ बन जाती हैं
कुछ कहानियाँ
कविता बनकर
मुझमें घर कर जाती है
कुछ कविताएँ
चोला चढ़ाकर
मूर्तियाँ बन जाती हैं
कुछ कहानियाँ
झटक कर अपना सारा स्थूल
महज सुगंध
बन जाती हैं
Tuesday, October 19, 2010
धूप क्वांर-कार्तिक की
धूप झिलमिलाती है
नए पैटर्न बनाती है
छा जाती है छत पे
पापड़-बड़ियाँ सुखाती है
रोशनदानों से छनकर
कोनों को महकाती है
खुली खिड़कियों में समा
दरवाजे को मुँह चिढ़ाती है
मेरी कलम पर उतर
कविता लिखवाती है
आ जाओ घर-जल्दी-
साँझ हुई जाती है
धूप क्वांर-कार्तिक की
मुझे तुझ-सा बनाती है
नए पैटर्न बनाती है
छा जाती है छत पे
पापड़-बड़ियाँ सुखाती है
रोशनदानों से छनकर
कोनों को महकाती है
खुली खिड़कियों में समा
दरवाजे को मुँह चिढ़ाती है
मेरी कलम पर उतर
कविता लिखवाती है
आ जाओ घर-जल्दी-
साँझ हुई जाती है
धूप क्वांर-कार्तिक की
मुझे तुझ-सा बनाती है
Sunday, October 17, 2010
Subscribe to:
Posts (Atom)
मेरा काव्य संग्रह
Blog Archive
-
▼
2020
(2)
- ► 01/19 - 01/26 (1)
-
►
2018
(1)
- ► 03/04 - 03/11 (1)
-
►
2015
(23)
- ► 10/18 - 10/25 (16)
- ► 04/12 - 04/19 (4)
- ► 01/25 - 02/01 (2)
- ► 01/18 - 01/25 (1)
-
►
2014
(14)
- ► 11/02 - 11/09 (1)
- ► 09/07 - 09/14 (1)
- ► 08/03 - 08/10 (1)
- ► 07/06 - 07/13 (2)
- ► 05/25 - 06/01 (1)
- ► 03/30 - 04/06 (1)
- ► 03/09 - 03/16 (1)
- ► 02/23 - 03/02 (2)
- ► 02/16 - 02/23 (2)
- ► 02/02 - 02/09 (1)
- ► 01/12 - 01/19 (1)
-
►
2013
(16)
- ► 12/22 - 12/29 (1)
- ► 11/10 - 11/17 (1)
- ► 10/13 - 10/20 (1)
- ► 09/15 - 09/22 (1)
- ► 09/08 - 09/15 (1)
- ► 09/01 - 09/08 (1)
- ► 08/18 - 08/25 (2)
- ► 08/04 - 08/11 (1)
- ► 07/28 - 08/04 (1)
- ► 06/09 - 06/16 (1)
- ► 03/31 - 04/07 (1)
- ► 03/03 - 03/10 (1)
- ► 02/24 - 03/03 (2)
- ► 01/13 - 01/20 (1)
-
►
2012
(14)
- ► 12/09 - 12/16 (1)
- ► 10/28 - 11/04 (1)
- ► 09/30 - 10/07 (1)
- ► 09/16 - 09/23 (1)
- ► 08/12 - 08/19 (1)
- ► 07/01 - 07/08 (2)
- ► 05/27 - 06/03 (1)
- ► 04/22 - 04/29 (2)
- ► 04/01 - 04/08 (1)
- ► 02/26 - 03/04 (1)
- ► 01/29 - 02/05 (2)
-
►
2011
(75)
- ► 12/18 - 12/25 (1)
- ► 10/09 - 10/16 (1)
- ► 08/21 - 08/28 (1)
- ► 07/31 - 08/07 (2)
- ► 07/17 - 07/24 (1)
- ► 06/26 - 07/03 (3)
- ► 06/19 - 06/26 (4)
- ► 06/05 - 06/12 (2)
- ► 05/29 - 06/05 (5)
- ► 05/22 - 05/29 (6)
- ► 05/15 - 05/22 (6)
- ► 05/08 - 05/15 (1)
- ► 04/17 - 04/24 (4)
- ► 04/10 - 04/17 (4)
- ► 04/03 - 04/10 (4)
- ► 03/27 - 04/03 (3)
- ► 03/20 - 03/27 (4)
- ► 03/13 - 03/20 (5)
- ► 03/06 - 03/13 (5)
- ► 02/27 - 03/06 (6)
- ► 01/09 - 01/16 (1)
- ► 01/02 - 01/09 (6)
-
►
2010
(179)
- ► 12/05 - 12/12 (3)
- ► 11/28 - 12/05 (4)
- ► 11/14 - 11/21 (1)
- ► 11/07 - 11/14 (4)
- ► 10/31 - 11/07 (6)
- ► 10/24 - 10/31 (1)
- ► 10/17 - 10/24 (5)
- ► 10/10 - 10/17 (4)
- ► 10/03 - 10/10 (5)
- ► 09/12 - 09/19 (1)
- ► 09/05 - 09/12 (6)
- ► 08/29 - 09/05 (2)
- ► 08/08 - 08/15 (1)
- ► 08/01 - 08/08 (3)
- ► 07/25 - 08/01 (4)
- ► 07/18 - 07/25 (2)
- ► 07/11 - 07/18 (5)
- ► 07/04 - 07/11 (5)
- ► 06/27 - 07/04 (5)
- ► 06/20 - 06/27 (4)
- ► 06/13 - 06/20 (5)
- ► 06/06 - 06/13 (7)
- ► 05/30 - 06/06 (3)
- ► 05/23 - 05/30 (6)
- ► 05/16 - 05/23 (5)
- ► 05/09 - 05/16 (6)
- ► 04/25 - 05/02 (2)
- ► 04/18 - 04/25 (7)
- ► 04/11 - 04/18 (6)
- ► 04/04 - 04/11 (1)
- ► 03/28 - 04/04 (1)
- ► 03/21 - 03/28 (2)
- ► 03/14 - 03/21 (5)
- ► 03/07 - 03/14 (3)
- ► 02/28 - 03/07 (6)
- ► 02/21 - 02/28 (3)
- ► 02/14 - 02/21 (5)
- ► 02/07 - 02/14 (7)
- ► 01/31 - 02/07 (5)
- ► 01/24 - 01/31 (6)
- ► 01/17 - 01/24 (6)
- ► 01/10 - 01/17 (5)
- ► 01/03 - 01/10 (6)
-
►
2009
(70)
- ► 12/27 - 01/03 (7)
- ► 12/20 - 12/27 (7)
- ► 12/13 - 12/20 (7)
- ► 12/06 - 12/13 (7)
- ► 11/29 - 12/06 (4)
- ► 11/15 - 11/22 (6)
- ► 11/08 - 11/15 (7)
- ► 11/01 - 11/08 (6)
- ► 10/25 - 11/01 (6)
- ► 10/18 - 10/25 (7)
- ► 10/04 - 10/11 (2)
- ► 09/20 - 09/27 (4)
about me
- डॉ. राजेश नीरव
- मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।
















