Wednesday, January 5, 2011

रोमेंटिक कम्युनिस्ट

मैं तुम्हें पसंद करती हूँ
इसलिए नहीं कि
तुम आर्दशवादी हो
या कि व्यक्तित्ववान हो
या हर चीज को परखते हो तुम
अपने नजरिए से

बल्कि इसलिए कि
तुम एकदम जुदा हो
आम आदर्शवादियों से
तुम्हारे पास है न गंभीर चेहरा
न भारी-भरकम बातें
न उत्तरदायित्व का युग-बोझ
न व्यवहार में कहीं खटकती शुष्कता या उथलापन
तुम एक किताब हो
जो हर पृष्ठ पढ़ने पर ही समझ आती है
केवल प्रस्तावना या उपसंहार पढ़कर नहीं

अपनी वैचारिक उलझनों के बीच भी
कब तुम रोमेंटिक हो जाओगे
कोई कह नहीं सकता
और कब मेरे काँधे पर सिर रखकर
युगीन समस्याओं पर सोच उठोगे
कई बार मुझे भी मालूम नहीं पड़ता
सच कहूँ, तुम्हारी इन्हीं संभावनाओं
और अनिश्चितताओं से प्यार है मुझे
और मैं निश्चिंत हूँ यह जानते हुए भी
कि मेरे कंधे पर टिका हुआ तुम्हारा माथा
सुलझा रहा है, कोई साहित्यिक समस्या
क्योंकि मैं जानती हूँ
लिखते, पढ़ते, सोचते
या कि बाजार से गुजरते भी
मैं तुम्हारे आसपास ही होती हूँ ( औऱ जैसा कि तुम अक्सर कहते हो)
आसपास और अंदर...

4 comments:

  1. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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  2. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  3. बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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  4. बहुत खूब .. शब्दों का चुनाव पसंसा जनक है


    www.kushkipoetry.co.cc

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।