Tuesday, January 4, 2011

रचनाः चार प्रक्रियाएँ

1 धीरे-धीरे
छूटती है केंचुल
और सर्प पाता है
पुनः दृष्टि
2
धीरे-धीरे
जमती है पर्तें
और निर्मित होता है
मोती सीप में
3
धीरे-धीरे
बुनती है जाल मकड़ी
और पकड़ लेती है शिकार
4
धीरे-धीरे
चढ़ता है नशा
और हरेक भूल जाता है दर्द को।

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।