Thursday, October 21, 2010

मुद्दत हुई

गुजारे नहीं लम्हें अपने साथ
देर तक जागकर
लिखी नहीं नज़म
बिना दूध की
तुर्श चाय नहीं पी नींबू डालके
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं दिन
तुम्हें याद करके
कुछ सोकर
कुछ खाकर
फिर सोकर
सपनों से सपनीले दिन
सरदर्द होने तक सोए रहने के
खाली कम खर्चीले दिन
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं
बस अपने होने को
सहने-सहते रहने वाले दिन
...................................
मुद्दत हुई
तुम अकेला छोड़कर कहीं नहीं गई
सुनो! क्या अब सचमुच कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी?

1 comment:

  1. भावनाओं से भरी रचनाओं, सिक्त कर गई। भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है!
    पक्षियों का प्रवास-१

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।