Monday, January 3, 2011

ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा

मुझको अर्घ्य में जल नहीं

अग्नि रूचती है
सूर्य, क्या तुम अपनी देय को
पुनः स्वीकारोगे
कष्ट, कष्ट, कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल धार-सा ही
मगर उमड़ा हूँ
जल, जल, जल
सिंधु
क्या तुम अपनी विवशता़
पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
भूल-भूलैया वाली सुरंगों
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी भीतर कोई रत्न पाए
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष, संघर्ष, संघर्ष
जीवन क्या तुम अपनी हठ को
पुनः स्वीकारोगे

2 comments:

  1. बेहद गहन और उम्दा प्रस्तुति।

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  2. सुन्दर व गहन प्रस्तुति..बधाई....परन्तु हमें यह सोचना चाहिये कि यदि हमारी कविता स्वान्त -सुखाय है तो ठीक ; अन्यथा यह कविता जन समाज (जिसे सामान्य जन कहाजाता है)को क्या देती है...क्या सन्देश है, क्या वह संप्रेषणीय है, कालजयी है...

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।