Thursday, November 11, 2010

सोई हुई तुम

ये बोझिल पलकें
थका हुआ जिस्म ये पसीना
जैसे झर जाती है पाँखुरियाँ
जैसे राख हो जाती है धूपबत्ती
देर तक खुशबू देकर
देर तक महक कर
...............................
कोई इसे जगाये क्यूँकर
..................................

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।