Thursday, March 17, 2011

ब्यास

हर पर्वतीय नदी
उतर आती है
पर्वतीय स्त्री-पार्वती-में
निरंतरता
निस्संगता
और निर्झरता में
...........................
पहाड़ी पुरुष मगर
नदी में पड़े
विशाल शिलाखंड-सा होता है
कुनमुनाता भी है तो
बड़े जतन में

2 comments:

  1. आज कल खूब प्रकृति से बिम्ब लिए जा रहे हैं ..अच्छी प्रस्तुति

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक..होली की शुभकामनायें!

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।