Monday, November 1, 2010

डॉन क्विग्जोट

खुद को
इतिहास में
देखने के लिए
तुमने क्या नहीं किया
चेहरे बदले
कद को तराशा
कभी इधर, कभी उधर
कभी तटस्थ हैं हम
दुनिया को बतलाया
कभी हँसे, कभी रोए
कभी हँसाया-रूलाया
गोयाकि हरसंभव कोशिश की
मगर बड़ा जालिम
निकला इतिहास
तुम्हारा नाम उसमें
शामिल किया भी तो
विदूषकों की सूची में
(खैर गलती किससे नहीं होती,
अभी अगला संस्करण भी तो निकलेगा इतिहास का)

1 comment:

  1. हर अच्छाई को ताक पस्र रख कर भी अपना नाम इतिहास मे दर्ज करवाने वालों की कमी नही। अच्छी लगी रचना। बधाई।

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।