Friday, December 3, 2010

जैसे खुशबू छूती है फूल को

मैं हर वक्त
देखना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे तुम पर छाया रहने वाला आसमान देखता है तुम्हें
जैसे तुम्हारे पैरों तले बिछी जमीन देखती है तुम्हें
जैसे तुम्हारे चारों ओर तनी हुई दिशाएँ देखती है तुम्हें
मेरी आँखे देखना चाहती है तुम्हें
हर उस कोण से जैसे
सारी कायनात और
उसका जर्रा-जर्रा देखता है तुम्हें
मैं हर वक्त छूना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे खुशबू छूती है फूल को
जैसे हवा छूती है बदन को
जैसे शरीर छूता है रूह को
जैसे छूती है रोशनी जमीन को
मैं समर्पित होना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे अँधेरा ज्योति-किरण को
जैसे जिस्म मीठी चुभन को
जैसे शाम चंदन-बदन को
जैसे खुशबू किसी चमन को

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।