Friday, November 5, 2010

देखता हूँ तुम्हारी आवाज़

मैं देखता हूँ तुम्हारी आवाज़ को
तुम्हारे होंठ
खुलते हैं, फड़फड़ाते हैं
चौड़े होते हैं, सिकुड़ते हैं
मिलते हैं, खिलते हैं
आगे को आते हैं, पीछे जाते हैं
दाँतों से टकराते हैं
जुबाँ के उपर-नीचे
हिचकोले खाते हैं
मैं तुम्हें देख रहा हूँ बस
तुम बोल रही हो
शब्द-दर-शब्द
शायद इनका कोई अर्थ भी होगा
मगर मैं सुन रहा हूँ
वो अर्थातीत सौंदर्य
जो तुम्हारे होंठ
फूल से खिलकर
बरसा रहे हैं
प्रतिपल-प्रतिक्षण
और लो
तुम नाराज हो रही हो
कि मैं तुम्हारी बात नहीं सुन रहा हूँ
हे भगवान ! (यदि तुम हो तो)
इसे कुछ समझाओ

10 comments:

  1. हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई
    जब सब हैं हम भाई-भाई
    तो फिर काहे करते हैं लड़ाई
    दीवाली है सबके लिए खुशिया लाई
    आओ सब मिलकर खाए मिठाई
    और भेद-भाव की मिटाए खाई

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  2. वाह वाह! क्या गज़ब कर दिया…………।ये होता है कवि मन जहाँ रवि भी नही पहुंच पाता वहाँ आखिर पहुंच ही गया…………बेइंतिहा खूबसूरत रचना दिल मे उतर गयी…………बेहतरीन अभिव्यक्ति।
    दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

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  3. आपका ब्लोग फ़ोलो नही कर पा रही फ़ोलो विंडो काफ़ी बडि खुल रही है जिससे फ़ोलो नही हो पा रही।

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  4. दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

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  5. सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    -समीर लाल 'समीर'

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  6. दीयों के इस पर्व दीपावली की आप को हार्दिक शुभकामनाएं
    ये दीप पर्व आपके और आपके परिजनों के जीवन को खुशियों के प्रकाश से भर कर दे

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  7. बहुत सुन्दर .
    अन्नकूट की बधाई !

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।