Wednesday, December 1, 2010

चाँद को गुनगुनाते मैंने सुना है

हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को

देर रातों में मैंने कई बार सुना है
सुरमई रातों में जब बादल गहराएँ
बदली के आँचल से जब तारे छिप जाएँ
कभी-कभी हो जब
दीदार चाँद का
तब मीठा-सा मैंने कोई गीत सुना है
हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
फीकी-फीकी हो चाँदनी जब
ख़ामोश हो फ़िजा सारी
दर्द की एक बस्ती को
आहिस्ता-आहिस्ता मैंने सुना है
हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
महकी-महकी हो जब रातें
गा रही हो महफ़िल सारी
आकाश के कोने में चाँद को
सिसक-सिसक कर गज़ल गाते मैंने सुना है
तुमने चाँद को कभी
गुनगुनाते सुना है
मैंने सुना है

2 comments:

  1. वाह! सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  2. वहुत मार्मिक एहसासों के शब्द दिए हैं आपने इस कविता की सुंदरता के लिए. बधाई.

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।