Wednesday, December 8, 2010

स्त्री बनाम पेड़

वृक्ष-सी होती है स्त्री
उगती है किसी आँगन
छाया किसी और आँगन देती है
ताड़-सी बढ़ना
फलो-फूलो
ममता भरी छाँह
ये सारे
रूपक, उपमाएँ
किसी और का नहीं
स्मरण कराते हैं स्त्री का ही
औऱ स्त्री भी निभाती है
इन सभी को बखूबी
तभी तो ताड़-सी बढ़ती अपनी बढ़त को
फुनगी कटवाकर
चुपचाप अपनी
तमाम शिखरीय संभावनाओँ को
कटवा कर
आशीर्वाद पाती है
फलो-फूलो
और कभी इच्छा, कभी अनिच्छा
से फूलती है, फलती है
तानों-उलाहनों के पत्थर मारे जाने पर भी
देती है फल मीठे
फूलती है चंदन-सुवासित गंध-सी
जिसकी सुगंध घर-भर अनुभव करता है
धीरे-धीरे अपनी जड़ें
गहरी जमाकर
वह बन जाती है वट (दादी, नानी, अम्माँ)
और देती है ममता भरी छाँह
और फिर अपनी शिराओं को
लटकाकर जमीन पर भेजती हैं
ताकि फूटे फिर नई कोंपलें
और फिर किसी दिन (हाँलाकि यह नहीं है सुखद)
कटवा कर उसे
बनवा ली जाती है कुर्सियाँ, टेबलें और घर के दरवाजे की चौखटें
स्त्री पुनः आँख, गोद, बाँहें बन जाती है....

इन चौखटों, कुर्सियों, टेबलों में

1 comment:

  1. ओह! बेहद गहन और सार्थक रचना स्त्री जीवन के सच को दर्शाती हुयी।

    ReplyDelete

मेरा काव्य संग्रह

मेरा काव्य संग्रह

Blog Archive

There was an error in this gadget
Text selection Lock by Hindi Blog Tips

about me

My photo
मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।