Thursday, December 17, 2009

इस दुनिया के लोग




प्रेम करो तो चौंकते हैं इस दुनिया के लोग
कतरा के निकलो तो रोकते हैं इस दुनिया के लोग


मैं कितनी उम्मीद से आया था इस शहर में
हर कदम पे नाउम्मीद करते जाते हैं, इस दुनिया के लोग

मेरी पेशानी पे हैं अब भी चिंता की लकीरें
गले में फूलों को हार पहनाते हैं, इस दुनिया के लोग

मैं अपनी ही दुनिया में गुम रहना चाहता हूँ
मुझे खींच के इस दुनिया में ले आते हैं, इस दुनिया के लोग


हँस लो मेरे हालात-ए-जुनूँ पे तुम भले आज
कल मेरी बहकी बातों को फ़लसफ़ा बताएँगे इस दुनिया के लोग

मैं अपनी धुन का पक्का हूँ जिस तरह
मेरी कब्र भी वैसी पक्की बनवाएँगें, इस दुनिया के लोग

Wednesday, December 16, 2009

समंदर




सुबह सहलाता है
दोपहर नहलाता है
रुमानी हो जाता है शाम को
रात को दहलाता है
है तो एक ही,
मगर आठ पहर में
सोलहों श्रंगार दिखलाता है

Tuesday, December 15, 2009

गोवा




उन्मुक्त,आधे चाँद की रात है
सुरीला सागर तट है
नारियल-वन की सौगात है
सागर सुनती तुम हो
हाथ में कापी-कलम
लहरों की दवात है
मैं नशे में हूँ यूँ ही
काजू-फेनी की क्या औकात है

Monday, December 14, 2009

' म '




देश को
पुर्तगाल-संस्कृति की
देन-विरासत(म)

पंजिम
वास्को-डि-गाम
लुटालिम
पलेम
कानकोनम
पलोलेम
और
.................

हम.......

Sunday, December 13, 2009

नफ़ासतपसंद




कभी झींगा
कभी स्टारफिश
कभी केंकड़ा
कभी शंख-सीपी
कभी संरचना अनाम
फेंक-फेंक-सा देता है
समुद्र
कूड़े-सा किनारे पर
.......................
कचरा कभी अपने साथ
नहीं ले जाता
समुद्र

Saturday, December 12, 2009

शास्त्रीय




कभी मंद
कभी द्रुत
कभी विलंबित
कभी सतत्


कैसा भी गाए
-समुद्र-
पक्का गाता है
.............................

Friday, December 11, 2009

निशाचर समुद्र




सोया भी जा सकता है
समुद्र किनारे
लहरों की लोरियां
सुनते-सुनते.....

मगर क्या यह
समुद्र का मान-भंग
करना न होगा

कोई कैसे
सो सकता है
जब सागर
जाग-आलाप रहा हो


शायद समुद्र
रात को
ज्यादा जागता है....!

Thursday, December 10, 2009

रात पलोलेम की

एक कौंध-सी
दौड़ती है
एक कोने से
दूसरे कोने तक
सफेद,फेनिल बिजली
रोशन करती है
समुद्र-तट
............
जाने क्या ढ़ूढ़ती
फिरती है लहर

Wednesday, December 9, 2009

रंग गोवा के


हरे-कच्च पहाड़
सफेद-नीला पानी
लाल-हरे-नीले
फिरोज़ी-जामनी-पीले
मकान ढलवां-खपरीले
रंग-बिरंगे कलात्मक परिधान
गोरे-सफेद-सांवले लोगो के
आबी-शिहाबी-धानी
रानी-अंगूरी-आसमानी
समुद्री-सीप और शैवाल

उससे ज़्यादा रंगों की शराब
सफेद-ललछोंहे फूल कनेर के
मिलते-जुलते समुद्री रेत से
इन सब पर भारी, आठों याम
बदलते रंग समुद्र के

......................
और मुझ पर है छाया
धूप-हवा-पानी के रस्ते
चेहरे-हाथों- बालों वाला
गहरा होता रंग तुम्हारा

Tuesday, December 8, 2009

साबुत सीप समुद्र से


पलोलेम बीच पर
आज (तक) की
महत् उपलब्धि
मेरे हाथ लगी
एक समुद्री सीप
चिकनी...साबुत...मुक्ताभ...
जाने उसमें क्या है ?
कैसे बोलूंगा ?
मोती !
घोंघा !!
या सिर्फ कनियाँ रेत की !!!
जो हो मैं उसे
कभी नहीं खोलूंगा !!
राज जो अनायास
दिया है समुद्र ने मुझे
कभी उसे नहीं खोलूंगा.....

Monday, December 7, 2009

{ढ़ाई आखर

यार! तुम बड़े साहसी हो

बड़े बेलौस, बिन्दास
अपनी कविताओं को
प्रेम-कविताएँ कह लेते हो
.........................
मैं तो अपनी लेखनी को
कविताएँ कहने में हिचकता हूँ
कविताओं को प्रेम-कविताएँ
इतनी आसानी से तो नहीं
नहीं ही कह सकता हूँ
सच तो यह है,मैं इस
शब्द को अपनी ज़ुबान पर
लाने में डरता हूँ
(और क्या सारी कविताऐं
प्रेम-कविताऐं नहीं होतीं )
...............
दुनिया सच कहती है
मैं अभी भी प्रेम करता हूँ

Sunday, December 6, 2009

आत्मपीड़क


जाने कितनी बार तुम
 दूर गई हो मुझसे
मगर हर बार
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा
करता हूँ उसी तरह
वैसा ही तनाव
वैसा ही खुमार सा
वैसा ही अधसोया-अधजागापन
वैसी ही बैरागी बेचारगी
वैसी ही रागात्मक आवारगी
वैसे ही बोल हल्के-हल्के
वैसे ही कदम ढलके-ढलके
वैसा ही प्यार नीले रंग से
वैसा ही बैर बदरंग से
वैसा ही लगाव रोशनी से
वैसा ही दुराव अंधियारे से
जाने कितनी बार
तुम दूर गई हो मुझसे

Saturday, December 5, 2009

मडगाँव




शांत,सुखद
मन को अच्छा लगने-सा
गोवा का एक कस्बा-सा
......मडगाँव.......
नारियल,कटहल के पेड़
होटल के दालान में
छाई ,लटकती
किसी बेल-सा
सुरम्य ठाँव
' यहीं रुको एक और दिन '
कहती है एक खूबसूरत गोवन-सी लड़की
...................................कहाँ जाँव ?

Friday, December 4, 2009

कोंकण( मुम्बई से गोवा)




हरियाले ख़ेत पानी भरे
पहाड़ भी हरे-हरे
मख़मली कालीन बिछी मिट्टी
चारों ओर हरियाली,पानी
पहाड़ और पल-पल आती सुरंगें
उतर जाएं यहीं
डेरा डाल लें
मन में बस गया
कोंकण का शवाब
मगर ,-मुम्बई की ग़र्मी से या
रात्रि –जागरन से-
बोले तो हालत है ख़राब.....

Thursday, December 3, 2009

फिर भी मुम्बई




सैंकड़ों चमचमाते ,बजते,
एक सीध में लटके
स्टील के हत्थे
...........
थोड़ी देर में व्यस्तताएँ(लऊकर)
इन पर लटक जाएँगी
लोकल ट्रेन में

Tuesday, December 1, 2009

नई तरह


अब मुझे फिर से
कविता नजर आने लगी है
दौड़ते वाहन, भागते लोग, धूल-गुबार
तेल भरी हवाएँ, पसीना
सबमें एक लय, एक ताल
सुनाई आने लगी है
बेढंगी चाल, बेढब हाल, खोई सी नजर
असमान साँसें, फिर से
एक तरह पाने लगी है
जंगली घास का छोटा फूल
फुदकती गोरैया, रंग-बिरंगी सब्जियाँ,
आसमान में बनता इंद्रधनुष
सब पर नजर जाने लगी है
अब मुझे फिर से
कविता नजर आने लगी है....

Friday, November 20, 2009

रिचार्जिंग




बारिश के पानी को
छत के परनाले में
एक पाइप लगाकर
छोड़ दिया एक टंकी में
धारदार-तुलतुल-बूंदबूंद
जिस तरह से आए
हो जाए इकट्ठा....
काश ! मैं भर सकूं
खुद को भी इस तरह
.............
मगर आसमान से मेरी छत पर
इन दिनों बरसती है
उदासी झमाझम
कर लूँ संचित !
ढेर चाहे कचरे का हो
मूल्यवान हो जाता है एक दिन
देखा-सुना है
मेरी उदासी भी अर्थवान हो उठेगी
इकट्ठी हो कर......!

Thursday, November 19, 2009

इन्दौर




चक्रवात !
जिसमें होती है
एक केन्द्रित शक्ति
जो घूर्नित होती रहती है
निरन्तर ,ले जाती है किनारे से
अंदर क्रमश और अंदर
पत्तों, फूलों और तितलियों को
सान देती हैं उन्हें
धूल के गुबार की एक अवर्नित वेदना से..
.....................
दूर से देखो तो चक्रवात
कितना खूबसूरत दिखाई देता है
किसी गुब्बारे या फूल के गुच्छे-सा
...............................
कभी आओ इन्दौर तो
चक्रवात की अंदरुनी असलियत देखो

Wednesday, November 18, 2009

रंगत सांवली-सी


जिन लोगों से मिलकर हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही शख़्सियत हमें चाहिए
जिन जगहों पर जाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही जगह हमें चाहिए
जिन गीतों को गाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही जिंदगी हमें चाहिए
जिन रंगों को देखकर हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही रंगत हमें चाहिए
जिन पर मिट जाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि उनका बने रहना ही हमें चाहिए


हिंदी दिवस (!)













विचार

किसी भाषा के
गुलाम नहीं
लेकिन
अपनी भाषा में
सब कुछ
कहना भी आसान नहीं
अपनी भाषा में गाओ, गुनगुनाओ मगर
दूसरी जबान को भी
समझो, सराहो
दिल बड़ा हो तो
तमाम अनुभूतियाँ
दामन थाम लेती है
क्योंकि
सारी नदियाँ
समंदर में विराम लेती है....



Sunday, November 15, 2009

शरद ऋतु






सर्द रात के बाद गुनगुनी सुबह आबाद है
मैं हूँ ,याद है,मौसम औ मन पे शवाब है

आँख है कि खुल के भी मुंदी जाती है
एक हसीन चेहरे का अभी भी ताज़ा ख़्वाब है

वो सामने है पर दिखाई नहीं देता
ज़ुल्फें भी कमबख़्त बन गई हिज़ाब हैं

Saturday, November 14, 2009

पचमढ़ी




लंबे समय के बहाव से
काटे गए गहरे, उथले, ऊँचे-नीचे रास्तों के बीच
रेत, गोल पत्थरों और
हरियाली के छोटे-छोटे टापूओं को चारों ओर से घेरकर
कल-कल बहता रहता है
झरनों से गिरने के बाद
समतल में पानी...
.....


कैसे अपने बहने / होने / बहते रहने को
किसी भव्य चौखट में जड़ी
कलात्मक तस्वीर की तरह
मढ़ देता है हमारे अंदर
मुझे अक्सर होती है हैरानी...।

Friday, November 13, 2009

इन दिनों




सूरज
आग बरसाता है
पारा
चढ़ता जाता है
ऊपर और ऊपर....
लेकिन
मुझे लगता है
दूर कहीं
बारिश हुई है
सौंधी महक आती है
तू
दूर जाती है
और तेरी
ज्यादा याद आती है....

Thursday, November 12, 2009

चलो,बबूल ही सही,मगर....


काँटें,काँटें,काँटें ही नहीं
बारिश के बाद
बबूल पर भी आते हैं फूल पीले
..........
दो थोड़ी-सी नमी तो
पत्थर पर भी
जम जाती है काई हरी
...........
थोड़ा कुरेदो ,भटको तो
रेगिस्तान में भी
खिला मिलता है नखलिस्तान
...............
सहला भर दो
तो दर्द दवा बन जाता है
बदरंग रोंआं रंगीन
बन जाता है
......
मैं भी मुतमइन हूँ
कोई मुझे भी दे
बारिश,नमी,भटकन,सहलन....
इन्सान बना दे

Wednesday, November 11, 2009

ये आँसू-2




इसलिए नहीं कि
तुमसे दूर हो गया हूँ
इसलिए नहीं कि
बरसों-बरस साथ रहने से
आदत हो गई है
इसलिए नहीं कि
तुम वहाँ कैसे,क्या करोगी
जैसे प्रश्न मुझे मथते हैं
इसलिए तो कतई नहीं कि
अब मुझे अपने काम ख़ुद करने होंगे
इसलिए भी नहीं कि
हड़बड़ी के वक्त
चाबी,पर्स,रुमाल,कंघा और मोज़े
ढ़ूढ़ कर कौन देगा
इसलिए नहीं कि
उठेगा
जब बांहो में तूफान
तो जिस्म एक पास नहीं होगा
इसलिए नहीं कि
नींद में मेरा हाथ
उठकर किस पर गिरेगा
इसलिए नहीं कि
मेरे कमीज के बटन कौन टांकेगा
कौन मेरे कपड़े धोएगा
मेरी चिड़चिड़ाहट,मेरा गुस्सा
कौन शांति से सहेगा
इसलिए नहीं कि
बगीचे में होने वाले
छोटे-छोटे परिवर्तन किसे दिखाऊंगा
ग़ुलाब,गुलदाऊदी,गुड़हल या
गुलमोहर का पहला फूल
तेज़ हवा,गहरे बादल,झमाझम बारिश
हरियाते खेत,चारों ओर भरा पानी
अब किसे दिखाऊंगा
रात के खाने के बाद
ज़बरदस्ती,अपने साथ,
अब किसे घुमाऊंगा
(खुद भी शायद ही जाऊंगा )

बल्कि इसलिए कि
.................
...मैं ..तुम्हें..
तुमसे...मैं..
............
कह नहीं पाऊंगा

Tuesday, November 10, 2009

तीस्ता-2


तीस्ता, ओ तीस्ता, ओ तीस्ता
तू संग चले
ओ तीस्ता

मैं चलूँ जिधर
मैं जाना चाहूँ कहीं
तू रोकती मेरा रास्ता
क्या चाहे तू
ज़रा ये तो बता
तीस्ता ,ओ तीस्ता,ओ तीस्ता........

Monday, November 9, 2009

कामायनी

बाहर झंझा ,आँधी,,बिजली,

उनचास पवन, सौ तूफान आएं
मजाल कि हमारे-तुम्हारे
कभी दरमियान आएं
जैसे डूबती नहीं बल्कि
ऊपर और ऊपर उठकर
तैरती रहती है नाव
चाहे झील में कितना ही
पानी,कितने झरने,कितनी ही
धरधराती धाराएँ आएं....



Sunday, November 8, 2009

किस्मत



अपनी तारीख़ में
तारीक के सिवा
कुछ भी नहीं
आपकी तारीफ़ में
तारीख़ के सिवा
कुछ भी नहीं


Saturday, November 7, 2009

मूरत



तू जनता का नहीं

अजन्ता का कवि है
कहता है एक दोस्त
सुनो
समझो कुछ
कितना सही कहता है
अनजाने वो बेचारा

Friday, November 6, 2009

सम्यक्



जो अन्ततःसमुद्र में मिलती है
जिसे हम समझ बैठते हैं
झील या डबरा

हरेक जिन्दगी एक सम्पूर्ण पेय है
जिसे हम समझ बैठते हैं
पानी खारा


वस्तुतः जीवन एक औपन्यासिक कृति है
जिसे हम समझ बैठते हैं
लघुकथा


सबका जीवन एक परंपरा है
जिसे हम समझ बैठते हैं
क्षणव्यथा


अच्छा हो अगर हम पहचान लें
अपने जीवन की
प्रवाहितता, सम्पूर्णता,
औपन्यासिकता और परंपरा
वरना एक सूने, रवहीन, रेगिस्तान में
परिवर्तित हुआ जा रहा है
जीवन हमारा.......




Thursday, November 5, 2009

ख़ज़ाना





तनहाई
हो किसी को काटती
किसी के लिए ख़ला
ख़ाली किसी के लिए
............................
मेरे लिए तो ख़ज़ाना है
क्योकि इन्ही लम्हों में तो
तुम्हारा आना-जाना है
...............


Wednesday, November 4, 2009

आय'म पोयम लवर




कविता
सबसे पहले पढ़ता हूँ मैं

कविता पढ़ना
अच्छा लगता है मुझे
किताबों ,कापियों,पत्रों.पत्रिकाओं
.अख़बारों या दीवारों पे
जहाँ कहीं भी लिखी हो
कविता
पढ़ता हूँ मैं
एक साथ कवि और दुनिया को
समझने का सबसे सरल और
सरस रास्ता
–कविता-
समझता हूँ मैं
सुबह-दोपहर-शाम-रात
सोते-जागते-खाते-पीते
जब भी मिले मौका
-कविता पढ़ने का-
मौका नहीं चूकता हूँ मैं

Sunday, November 1, 2009

कोई आखिरी नेपथ्य नहीं होता




प्रकाश-वृत्त में और पर्दे
के आगे खड़ा नहीं
रहना होता हमेशा...
अपनी भूमिका निभाने के बाद
छोड़ना ही होता है
मंच
जाना ही होता है
नेपथ्य में, पर्दे के पीछे
अभिनेता बड़ा हो या छोटा
.............
मगर जिन्दगी नाटक नहीं
यहाँ कोई नेपथ्य नहीं होता
पर्दे के पीछे पर्दे
नेपथ्य के पीछे नेपथ्य
-यही क्रम आगे भी-
बदलते हैं केवल रोल
और यह तो हर कोई है जानता
-बहुरूपियों के लिए
नेपथ्य का कोई
अर्थ नहीं होता-






तीस्ता रे.....!




ओ नदी के धारे !
मैं कब आऊंगा पास तुम्हारे ?

मैंने देखा है एक सपना
मैं रह रहा हूं
एक ऐसी जगह
जहाँ बहती है
तूफानी नदी
मेरे घर के द्वारे.....


Saturday, October 31, 2009

तुम दूर हो


सोचा था वह कुछ और था
क्य़ोकि दूर रहकर
लिखता-लिखाता नहीं
चिढ़ता-चिढ़चिढ़ाता था......






Thursday, October 29, 2009

ये आँसू....



जैसे जज्ब़ कर लेती है

सिंचिंत सारा पानी

गुडाई की गई मिट्टी

कि पौधे को मिल सके

नई शक्ति ,जीवंतता ,नमी,जीवन

देर तलक....ः

वैसे ही मैं पी जाता हूँ

अंदर ही अंदर

ताकि लिख सकूं

और ऊर्जित भी,

जो तुम्हें दे सकूं देर तलक.....

Wednesday, October 28, 2009

शोध !



मैं क्य़ा खोजने जाता हूँ



पर्वतों पर


जो मुझे मिलता नहीं


कहीं पर


(अज-कम-अज नहीं ही


अभी तक)

Tuesday, October 27, 2009

गोरखधंधा



विषम साँसों का सम हो जाना



..................... तुम्हारा जाना


सम साँसों का विषम हो जाना


तुम्हारा आना


(कभी-कभी उलटबांसी हो जाना


......................)

Monday, October 26, 2009

एक सुख





जीवन हो


कविताओं के आसपास


या हों कविताएँ जीवन के आसपास

Sunday, October 25, 2009

खुशनसीबी
मैं सोचता हूँ
कितने ख़ुशनसीब है वो लोग
जिनके जीवन के आसपास

एक पुरानी
महबूबा हो......

कभी-कभी

मुझे भी ऐसी
खुशनसीबी हासिल होती है
जब तुम
बहुत दिनों बाद
वापस आती हो









Saturday, October 24, 2009

24 जनवरी















कुछ तारीख़े
बन जाया करती है
कविता......

Friday, October 23, 2009

उदास चाँद



तुम हो, 
मैं हूँ
 चाँदनी रात है ,
चाँद फिर भी उदास है.........
मैं और मेरी तनहाई

Thursday, October 22, 2009

बातूनी













मैं बोल पड़ी
और तुम्हारा तसव्वुर
टूट गया
काश कि रह पाती चुप
तुम्हारे लगातार देखे जाने के
समय
गया
तुम लौट आए
फिर अपनी
चंचल और शरारती
बातों की ओर
गहरी और संजीदा
ख़्यालों की दुनिया से
काश कि रह पाती चुप
जब तुम मुझे देख रहे होते

महक






वो

देर तक

महका किए

मेरे तसव्वुर में

ताजा ग़ुलाब की तरह

खामोशी


 बहुत कोशिशों के बाद , सिर्फ इतना बोली खामोशी मैं भी बहुत मुखर थी कभी अब सिल लिए हैं होंठ होंठ क्योंकि जब भी खुलते हैं दूरियाँ बढाते हैं.........

लक्ष्य


1

मैं उपलक्ष्य नहीं
लक्ष्य पहचानता हूँ
इसीलिए
मछली की आँख नहीं
द्रुपद कुमारी की
बाँह थामता हूँ
2
लक्ष्य मेरा भी है
लेकिन
वह मछली नहीं
आँख नहीं
द्रुपद कुमारी नहीं
3
खो सा गया है
लक्ष्य मेरा
उपलक्ष्यों के लबादे के नीचे
या कि
दुबका हुआ
काँपता है
4
उपलक्ष्य नहीं
लक्ष्य नहीं
दौड़ नहीं
केवल
घूमना-घूमते रहना सतत
कोल्हू के चहुँओर
निरंतर....
5
क्या लक्ष्य पर
पहुँच कर
हो जाना
लक्ष्यहीन ही होता है
लक्ष्य
या कि
पहुँचना
उस बिंदू तक
जिसके आगे
लक्ष्य नहीं।

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।