Sunday, December 6, 2009

आत्मपीड़क


जाने कितनी बार तुम
 दूर गई हो मुझसे
मगर हर बार
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा
करता हूँ उसी तरह
वैसा ही तनाव
वैसा ही खुमार सा
वैसा ही अधसोया-अधजागापन
वैसी ही बैरागी बेचारगी
वैसी ही रागात्मक आवारगी
वैसे ही बोल हल्के-हल्के
वैसे ही कदम ढलके-ढलके
वैसा ही प्यार नीले रंग से
वैसा ही बैर बदरंग से
वैसा ही लगाव रोशनी से
वैसा ही दुराव अंधियारे से
जाने कितनी बार
तुम दूर गई हो मुझसे

1 comment:

  1. प्यार मे विरह भी जरूरी है, तभी तो इतनी अच्छी कविता लिखी जा सकेगी।

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।