Wednesday, May 11, 2011

एकदम से बदल जाता है मुकद्दर

हर बढ़ती हुई शै ही रवां होती है ,पूनम के बाद 
चाँद के साथ चाँदनी भी फ़ना होती है
तरक्की देखमा तो कुदरत की रवायत है,
 रोशन मशाल बुझते ही धुआं देती है

जो मेरा दोस्त था आज हमसफर है
,बदलते रिश्तों से ताज़गी बयां होती है

किसी पल एकदम से बदल जाता है मुकद्दर ,
इसके गहरे में मगर कायनात की रज़ा होती है



Wednesday, April 20, 2011

केसरिया है प्रेम म्हारो

एक फूल में
उगते हैं
दो फूल केसर
एक कहलाता है केसर
खुशबू, स्वाद, सौंदर्यवर्धक
दूसरा
कहलाता है घास
भाई लोग इसे
केसरिया रंग और खुशबू में
रंग, बना देते हैं केसर
असली-सा
कसौटी पर गर न चढ़े
तो कोई जान नहीं पाता असलियत
बिकता है ज्यादा नकली, असली से
मगर जब होती है पहचान
तब असल पाता है
अपनी जगह और मान
...............
प्यार जो मैंने किया है तुम्हें
काश! कभी कसौटी पर चढ़े
तब हो पहचान

Tuesday, April 19, 2011

सोनमर्ग

आए ढेरों मिसरे
लिख न पाया
एक भी
नज़म
एक भी गज़ल
बस उठा लिए कुछ बीज
जिन्हें
बनाने की कोशिश करूँगा
चिनार, सफेदा, देवदार, चीड़
या जो भी कुछ...

Monday, April 18, 2011

रोमांस

पत्ते चिनार के
रखती है सफ़ों के बीच
एक लड़की
गोकि याद रहे
चिनार बाग और कश्मीर
उन सफ़ों को खोलने का
वक्त भले ना हो
उसके पास



Sunday, April 17, 2011

पहलगाम

कल-कल लिद्दर
ठंडी छाँह
दसियों रंग
ढेरों फूल
महँगी रोटी, सस्ती धाम
जितने घोड़े, उतनी गाड़ी
अब तो नहीं
पहले होगा गाम
पहलगाम


Thursday, April 14, 2011

गुलमर्ग टॉप

बर्फ पिघलने से
उपजी
दलदली जमीन किनारे
उगा है जीवन
पीले-बैंजनी
नन्हें-से फूल
जीवन कहाँ-कहाँ
कैसे-कैसे पनपता है

Tuesday, April 12, 2011

बहता अम्रत

यहाँ पहाड़ों पर
खेतों के
ढलवाँ किनारे
दौड़ता है
बर्फ से निकला पानी
मैं कलपता हूँ मैदानी
हाय! व्यर्थ ही बहा जा रहा है पानी

Monday, April 11, 2011

डल किनारे

दौड़ रहा है
जीवन
बहते पानी-सा
और मैं किनारे

Sunday, April 10, 2011

गुलमर्ग

दूर से चमकती
दीखती थी बर्फ
श्वेत-धवल चाँदी-सी
पास पहुँचे
लिए धौंकनी साँसें
और पसीने से तरबतर
तो मिट्टी सनी बर्फ
गंदला पानी
और कीचड़ निकला
धत् तेरे की
गुलमर्ग भी
जिंदगी-सा
भ्रम औऱ नीरस निकला

Saturday, April 9, 2011

श्रीनगर ( 07-06-07 )

जल्द होती है सुबह
देर तलक रहती है रोशनी
मौसम फिर भी ठंडा और खुशगवार
शायद यही बात
गुजरती हो दुश्मनों को नागवार
फैलाते थे दहशत
करते थे मासूमों पर वार
अब
सबकुछ ठीकठाक
पुरसुकून, खुशमिजाज
ओ कश्मीर! तुझपे जाँनिसार

Friday, April 8, 2011

पटनीटॉप

दिन भर में मुझे मिला
थोड़ा-सा एकांतिक अनुभव
खुशबू चीड़ की
चीड़ की एक टहनी
और चीड़ की छाल
झुंड बनाकर बैठे कश्मीरी
उनके बच्चे
मासूम बच्चियाँ
सेब के रंग-से
रंग-बिरंगे फूल
चीड़ की सीकों की धूल
भरे हुए पाँव-पिंडलियाँ
धौंकनी साँसें
गुलाब के गुच्छों वाली हैज
शांत-एकांत वाली सेज
और रह गया – बच गया जो
सनासर, टूटे पेड़ों के तनों के
बीच से निकलता हो अमिता का सर
ऐसा फोटो लेने का अवसर
और माईलस्टोन-सा तुम्हारा कथन
सोच के होती है हैरानी कि स्साला ! पसीना कैसे आता होगा?

Wednesday, April 6, 2011

एंथेलियम

अभी-अभी चाँद के चारो ओर
रोशनी का एक घेरा देखा
अजीब-से रोमांच के साथ सोचा
महान आत्मा
जन्म लेती हो , न लेती हो
इस समय
दिव्य क्षण के जरूर
निकट होते है हम

Tuesday, April 5, 2011

ऐ सपने !

मैंने तो देख लिया
ऐसा सपना
जो कभी पूरा न होगा
मगर
कभी नहीं
ये निर्धारण कैसे मेरा
ये तो सपने के ही हाथ
कि वह वही रहे
या साकार हो जाए
ऐ सपने !
मैं तो तुझसे यही कहूँ
तू कभी पूरा न हो



Friday, April 1, 2011

ओ निर्माता

स्वयं को
अकेला रखने का मैंने
एक अजब तरीक चुना
पहले तुमसे जुड़कर
काटता रहा सबको
हर रिश्ते हर बंधन को
और जब सबसे मुक्त हो गया
तो तुमसे भी अलग हो गया
इस तरह मैं
पूरी तरह
मैं रह गया

Monday, March 28, 2011

हम अपरिभाषित

व्यक्तित्व से अस्तित्व तक की
देते रहे हम परिभाषा
बाँधते रहे उन्हें
कभी शब्दों से
कभी चुप्पियों में
कभी शब्द और सन्नाटे के अंतरालों में
किंतु स्वयं की न तो कभी दी परिभाषा
न बाँधना भाया किसी से
तो खुद अपरिभाषित
अपरिमित
निर्बंध रह गए।

Sunday, March 27, 2011

खोजने निकला तो

खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर...
कोई चंचल मिला, कोई शांत मिला
कोई खुश मिला, कोई अशांत मिला
कोई बौराया, कोई पगलाया-सा
कोई उदास, कोई निराश मिला
खोजने निकला तो
कोई प्यारा-सा, कोई न्यारा-सा
कोई जीता-सा, कोई हारा-सा
कोई उत्साहित, कोई विथकित
कोई अनुरक्त, कोई विरक्त
कोई यायावर, कोई सैलानी
कोई रमता जोगी, कोई तपी-ध्यानी
खोजने निकला तो
एक तुम ही न मिले
कहीं
ओ अभिमानी
ओ तेजोमय
ओ प्रभामय
ओ अमित स्वरूप
ओ मुझ मृग की तृष्णा के झिलमिल पानी
खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर एक तुम ही मिले



Saturday, March 26, 2011

ओएसिस की प्यास

जब कभी किसी कारण
तुम्हारी आंतरिक तन्मयता
हो जाती है भंग
तो मन पर एक अनजाना बोझ
छाने लगता है धीरे-धीरे
जो बढ़ता जाता है क्रमशः
और तुम नीरस यथार्थ के तंग रास्तों पर चलने को
मजबूर हो जाती हो
और छोड़ बैठती हो
मूल शांत व्यक्तित्व
कभी-कभी सोचता हूँ
बेचारा आम आदमी
कतई दोषी नहीं
अपने ढर्रे के जीवन से उपजे
उथले और सतहीपन के लिए
क्योंकि उसके पास तो कोई
आंतरिक स्रोत भी नहीं
जहाँ तर-तृप्त होकर
वह शांत हो सके



Friday, March 25, 2011

रचना में रहूँ तो मैं 'मैं' कैसे रहूँ

लिखूँ तो मैं केवल पुरुष कैसे रहूँ
क्योंकि मुझे निबाहनी है
मेरी ही नहीं
तुम्हारी भी कथा... व्यथा और अनुभूतियाँ
केवल अपने सत्य के सापेक्ष कैसे रहूँ
क्योंकि मैं तुम्हारे भी सापेक्ष हूँ
या तो स्वयं से भी निरपेक्ष रहूँ, तटस्थ रहूँ
या तुमको भी
रचना में स्वर दूँ
रचना में रहूँ तो
मैं
मैं कैसे रहूँ
ओ संगिनी
मैं तुमको संग ले
कुछ और ही हो जाऊँ
जब रचनारत होऊँ

Thursday, March 24, 2011

जल...जल...जल..

मुझको अर्घ्य में जल नहीं अग्नि रूचति है
सूर्य! क्या तुम अपनी देय पुनः स्वीकारोगे
कष्ट...कष्ट...कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल जल-सा ही
मगर मैं उमड़ा हूँ
जल...जल...जल..
सिंधु !  क्या तुम अपनी विवशता पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी कोई रत्न पाया
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष... संघर्ष... संघर्ष...
जीवन क्या तुम अपनी हठ पुनः स्वीकारोगे

Sunday, March 20, 2011

समय... समय... समय...

कभी सघन

कभी विरल
कभी सुनहरा
कभी बदरंग
कभी स्याह
कभी सतरंग
...............
मैं रंगों की नहीं
समय की बात कर रहा हूँ
कभी सापेक्ष
कभी निरपेक्ष
कभी घोर अँधेरे-सा
कभी रोशन किरण-सा
कभी रेशमी-मुलायम
कभी सख़्त फौलाद
अजीब गोरखधंधा है समय
कभी स्वर्णमृग बन जाता है
कभी अमृत-कलश बिंधवाता है
कभी लड़ता है युद्ध
कभी निष्कासन
कभी जल-समाधि दिलवाता है
समय
कभी बँट जाता है युगों में
कभी सतत चलता जाता है
कभी हारता है खुद से
कभी सबको हराता जाता है
समय
अजीब, अद्भुत, अनोखा
अनिर्वचनीय है समय
समय... समय... समय...



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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।