Wednesday, May 11, 2011

एकदम से बदल जाता है मुकद्दर

हर बढ़ती हुई शै ही रवां होती है ,पूनम के बाद 
चाँद के साथ चाँदनी भी फ़ना होती है
तरक्की देखमा तो कुदरत की रवायत है,
 रोशन मशाल बुझते ही धुआं देती है

जो मेरा दोस्त था आज हमसफर है
,बदलते रिश्तों से ताज़गी बयां होती है

किसी पल एकदम से बदल जाता है मुकद्दर ,
इसके गहरे में मगर कायनात की रज़ा होती है



6 comments:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (12-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  3. बहुत खूब ... दोस्ती रिश्ते में बदल जाए तो बात ही कुछ और होती है ....

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।