Tuesday, April 12, 2011

बहता अम्रत

यहाँ पहाड़ों पर
खेतों के
ढलवाँ किनारे
दौड़ता है
बर्फ से निकला पानी
मैं कलपता हूँ मैदानी
हाय! व्यर्थ ही बहा जा रहा है पानी

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।