Friday, April 8, 2011

पटनीटॉप

दिन भर में मुझे मिला
थोड़ा-सा एकांतिक अनुभव
खुशबू चीड़ की
चीड़ की एक टहनी
और चीड़ की छाल
झुंड बनाकर बैठे कश्मीरी
उनके बच्चे
मासूम बच्चियाँ
सेब के रंग-से
रंग-बिरंगे फूल
चीड़ की सीकों की धूल
भरे हुए पाँव-पिंडलियाँ
धौंकनी साँसें
गुलाब के गुच्छों वाली हैज
शांत-एकांत वाली सेज
और रह गया – बच गया जो
सनासर, टूटे पेड़ों के तनों के
बीच से निकलता हो अमिता का सर
ऐसा फोटो लेने का अवसर
और माईलस्टोन-सा तुम्हारा कथन
सोच के होती है हैरानी कि स्साला ! पसीना कैसे आता होगा?

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।