Tuesday, June 21, 2011

एक और बरसाती नदी


लगने लगी फिर
टूटती-सी लय
जिंदगी की
उद्दाम लहरों के
फेनिल शोर ने
ढँक लिया
मधुरव
दीन-हीन अकिंचन-सा
बैठा रहा
सागरिक
हिचकोले लेने लगी
खूँटे से बँधी नैया
गहरे-गंभीर
और खामोश सागर में
आ मिली
एक और
बरसाती नदी

Thursday, June 9, 2011

बिना दिल के जीता हूँ


एक दिन मैंने सोचा
अपने दिल के सारे टुकड़े
ढूँढकर लाऊँगा
फिर से इन्हें जोड़कर
नया दिल बनाऊँगा
खोज से लौटा तो
एक टुकड़ा और कम था
देखा था मैंने
दिल के टुकड़ों पर
लोगों ने अपने
आशियाने खड़े कर लिए हैं
रास्ते में एक शख्स
निराश खड़ा था
उसके पास
नींव में डालने को
कुछ भी न था
मैं
आखिरी टुकड़ा भी उसे दे आया
और खुद बिना दिल के जीता हूँ

Tuesday, June 7, 2011

एक उलझन ही सही


एक उलझन ही सही मगर कुछ है तो सही
उनके पास तो सिवा खालीपन के कुछ नहीं
इतना यकीन था खुद पर और परस्तिश पे
इबादत को खड़े हुए तो खामोशी ही पढ़ते रहे
कभी अजान देता मैं और काश कि वो आते
खुदा न सही, उसकी खुदाई के दीदार तो हो जाते
हाय री किस्मत क बेरहमी को देखिए
वो आते हैं मेरे सामने हमेशा बुत बनके
कभी बुत भी बोलेगा क्या बता दीजिए
(समझ लो जुबा खामोशी की खुद ही यार)
बुत को बोलने की सजा तो न दीजिए

Saturday, June 4, 2011

खुद बिना दिल के जीता हूँ


एक दिन मैंने सोचा
अपने दिल के सारे टुकड़े
ढूँढकर लाऊँगा
फिर से इन्हें जोड़कर
नया दिल बनाऊँगा
खोज से लौटा तो
एक टुकड़ा और कम था
देखा था मैंने
दिल के टुकड़ों पर
लोगों ने अपने
आशियाने खड़े कर लिए हैं
रास्ते में एक शख्स
निराश खड़ा था
उसके पास
नींव में डालने को
कुछ भी न था
मैं
आखिरी टुकड़ा भी उसे दे आया
और खुद बिना दिल के जीता हूँ

Thursday, June 2, 2011

कोई आँसू लेकर स्मित दे जाए


खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
मन का दामन छोटा हो और ढेरों खुशियाँ मिल जाए
तन पर रक्तिम कोना हो और ढेरों मरहम मिल जाए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
कंठ सून हो पथिक का और कदम लड़खड़ा रहे हो
साकी मदपात्र लिए ऐसे में खुद प्यासे तक आए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
सृजन की इच्छा हो मन में न शब्द मिले न भाव
ऐसे में आकर कोई मधु छंद लिखवा जाए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे
सारी खुशियाँ पराई लगे जब गम ही अपना साथी हो
तन्हाई का साथी बनकर कोई आँसू लेकर स्मित दे जाए
खुशी को जब न सहेजा जाए तो क्या कीजे!
किसी तनहा कोने में जाकर जीभर रो लीजे

Wednesday, June 1, 2011

तुम मेरे आकाश हो


मैं तुम्हारा आकाश हूँ
तुम मुझमें विचरण करते हो
तुम मेरे आकाश हो
तुम में मैं उड़ता फिरता हूँ
हम दोनों पंछी
एक-दूसरे के
हम दोनों आकाश
तुम चाहती हो उड़ना
मुझसे बाहर के आकाश में
तुम्हें अपने आकाश पर
विश्वास है
वह तुम्हारा ही रहेगा हरदम

Tuesday, May 31, 2011

कुकनूस है सचमुच कवि भी


कुकनूस जो जुटाकर
काष्ठ, टहनी
और चिता-सी उसको सजाकर
वेदना भरे हृदय से
रागमय मृत्यु-गीत गाता
गीत की उस ध्वनि से
हो जाते अग्निदेव प्रकट
और तदंतर
लपटें, लपककर
उस चिता को है जलाती
स्वयं की देह को वह
अग्नि को सौंप देता
अग्नि-स्नान की इस प्रक्रिया से
भस्म ही अवशेष रहता
उस राख से जन्म लेता
एक और कुकनूस अभिनव
कवि भी अग्नि-स्नान की इस यंत्रणा से
नित्य-प्रति है गुजरता
किंतु त्रासदी यह भयंकर
पूर्ण दग्धता को
वह पाता नहीं
अधजला रहकर
नित्य अपनी ही जलन में
प्रतिक्षण है जलता रहता

Monday, May 30, 2011

मार्क्सवाद की प्रथम प्रचारक


एक जगह
लेंपपोस्ट का मद्धम
आलोक था
आदमी से बड़ी
जहाँ से थी परछाइयाँ
एक अकेले शख्स को
वहाँ मैंने सिसकते पाया
पूछा नाम
तो वो बोला
करूण और दीन होकर
मैं
हैव्स नॉट/ सर्वहारा
एक जगह
थी कैंडल लाइट की सुरमई रोशनी
धीमे-धीमे संगीत में फ्लोर पर
एक शख्स को थिरकते पाया
आपका परिचय
मैं- वह धीमे से मुस्कुराया
मैं हैव्स/ बुर्जुआ
मैं उधेड़बुन में रहा
परेशानी में घिरा
चल पड़ा गम भुलाने
सागर से प्यार बुझाने
एक ही टेबल पर वहाँ
बैठे मैंने दोनों को पाया
तब मुझे बच्चन का
स्मरण सहज हो आया
मार्क्सवाद की प्रथम प्रचारक
मेरी प्यारी मधुशाला

Thursday, May 26, 2011

माथे पे लगी ये रोशनाई


देर तक सोचकरभी न लिख सके कुछ
कोरे कागज की रंगत ये बता देती है
तेरा हाल मुझको तेरी खामोशी बता देती है
तेरी कितनी बातें मुझे तन्हाई सुना देती है
एक मुद्दत हुई देखे को तुझेअब तो आजा
दूर से आती हवामुझको ये सुना देती है
चाहा कि लिखा जाए कोई खत
हश्र पुर्जा-पुर्जा हुई ये चिंदियाँ बता देती है
परेशानी बढ़ी ज्यादा तो उठाई होगी कोई कलम
तेरे माथे पे लगी ये रोशनाई बता देती है

जो 'था' के लिए, जो 'है' की तरफ से


कितना अच्छा लगता है
अकेले होना
दूर-दूर तक खामोशी
और बिखरा सन्नाटा होना
कितना अच्छा लगता है
शोर-गुल से काटकर
खुद को
कलमनुमा
सन्नाटे में बोना
फिर सन्नाटों की जमीन से
कविता बनकर निकलना
कोंपल-दर-कोंपल
फूटकर
कभी उदासी, कभी खुशी
कभी गम के मौसम के बीच
फूलना-फलना
पल्लवित होना
कितना अच्छा लगता है
अकेले होना
खुले आकाश में दिन भर उड़ते फिरना
कभी बादलों से, कभी इंद्रधनुषों से
कभी बारिश, कभी धूप से
गुफ्तगू करना
दिन भर यायावर की तरह फिरकर
वापस नीड़ में लौटना
साथ लाई यादों में से
तुमको चुनना
और घोंसलों में सजाना
सजाते हुए खो जाना
खोकर तुम्हारे पास होना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
और अकेलेपन के इस बीहड़ में
किसी खोह का होना
जहाँ शांति के संगीत का वास
सुनकर जिसे तुम्हें पाना
खुद को खोना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
वीरानों की मरू में
प्यासे मृग-सा भटकना
दौड़ना-दौड़ना निरंतर दौड़ना
न पाना
हार न मानना
और दौड़ना
और यकायक
ओएसिस पाकर
विस्मित होना
मारे खुशी के
अनुभूति शून्य होना
तृप्ति की कल्पना से घबराकर
रूकने से पहले ही
दौड़ और तेज कर देना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
कितना अच्छा लगता है बूँद-बूँद रिसकर
दो किनारों के बीच
धारा-सा बहना
और
सागर में मिलने से पहले ही
प्रवाह के विरुद्ध तैरकर
वापस स्रोत तक पहुँचना
और फिर बहते जाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
बिखरे पन्नों के बीच
खुद को पाना
सहेजना, संभालना
और क्रमबद्ध करते जाना
अनायास ही कहानी-सा बन जाना
और किसी खास किरदार में
तुमको पाना
भीड़ सी जुट जाना
और भीड़ के बीच
तुमको अलग-अलहदा अकेले पाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
डूबती शामों के साथ
विदा होते सूर्य को देखना
उड़ते पखेरूओं को बिनना
उनके कलरव को सुनना
भूली कोई बात याद आ जाना
कभी हँसी, कभी खुमार, कभी उदासी छा जाना
देर-देर तक देखना आसमान को
उगते तारों में से अपना तारा पहचानना
और खुद ही से
घंटों बात किए जाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
घड़ी का बंद हो जाना
समय का रूक जाना
तारीख और दिन की गिनती को
केलैंडर और घड़ी से उतारकर
स्पंदनों, धड़कनों से नापना
सुबह, शाम, दोपहर और रात
बस यही गिनती दोहराना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
सुबह देर तक सोए रहना
देर तक रातों को जागा करना
सूरज चढ़ आना सूरत पर
गर्मी के मारे नींद खुलना
अभी-अभी आए स्वप्न को देर तक
याद किया करना
जिसमें कहा हो तुमने
उठिए जनाब क्या कुछ और नहीं है करना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना

Tuesday, May 24, 2011

वो बच्चा है सचमुच



वो नहीं डरता है मुझसे
बिल्कुल नहीं
जब वो अपने मूड में होता है
मेरी धमकियाँ, मेरी आँखें
मेरी डाँट और मेरे आँसू तक
सब बेअसर होत हैं, उस पे
बस वो करता है, उधम ढेर सारी
वो नहीं रूकता, बिल्कुल नहीं रूकता
मेरे लाख कहने पर भी
पर कभी-कभी
वो डर जाता है मुझसे
बहुत डर जाता है
रूआँसा हो जाता है
मेरी जरा-सी बात पर
वो बच्चा है सचमुच
बड़ा बच्चा

Monday, May 23, 2011

जीना मुहाल है


उफ् ये बंदिशें
ये ताने ये तंगियाँ
जीना मुहाल है
मुझे मयस्सर होगी
कब तुम
कब मिलेगी
तुम्हारे साथ तनहाइयाँ
जीना मुहाल है
तेरे गेसुओं की छाव
तेरी शोखियाँ
कब बजेगी शहनाइयाँ
जीना मुहाल है
अब मुश्किल है इंतजार
मुश्किल हर पल है
अब मुश्किल है जीना
जीना मुहाल है

अपनी नावें, अपने द्वीप


सागरिक
छोड़ो मोह
उन कूलों का
जिन पर लिखी
लीक की भाषा
साहस हो तो खोजो
जीवन बीच भँवर में
देख थके ना तेरी बाँहें
तुझे सर्जना है
नव-परिभाषा

Sunday, May 22, 2011

अनुमान


बहुत
शिद्दत से
यह लगने लगा है
अब मुझे
कि खुलेंगी
सारी गुत्थियाँ
झर जाएँगें, सब अवसाद
लंबी खामोशी के बाद
फिर से
लिखूँगा मैं कथा-कविता-उपन्यास




Friday, May 20, 2011

ज़िद


जिंदगी तुझसे माँगी है
 सर छुपाने को छत
खड़े रहने को जमीं
और साँस लेने भर हवा
खुशी से दे तो अहसान
वरना मेरी तो जरूरत है
ले लूँगा किसी भी तरह
बिना कोई दिए कीमत

Thursday, May 19, 2011

ऐसा भी वक्त आता है

बिखरे बाल
मन उदास
कभी रूकी, कभी तेज चलती साँस
न खुद का न किसी और का
न तन्हाई का खयाल
रूके हुए सृजन का
उलझती हुई राहों का दुख
बढ़ती हुई समंदर की प्यास
छटपटाती हुई आत्मा का त्रास
पेशानी पे सिलवटें सोच की
आँखें दूर कहीं
मगर टिकी हुई नहीं
उमड़ती घुमड़न का शोर मचाता ज्वार
लहरों से टकराते
बेतरतीब विचार
कभी-कभी
ऐसा भी वक्त आता है
जिंदगी में

Wednesday, May 18, 2011

मंजूषा


सत्य को नहीं
सहेजूँ यदी शब्दों में
तो जल्द ही मुझसे
वह खो जाता है
बैठ जाता है कहीं
तलहटी में
मन एकाकी उपर
रह जाता है
कहानी, कविता
ये सब मंजूषा है

Tuesday, May 17, 2011

कब? आखिर कब!


धूप-छाँह के अंतहीन सिलसिले में
कोई गहरी छाँह पर
दिन-रात के घूमते चक्र में
अपनी-सी एक शाम कब
बासंती, हेमंती, पतझड़ी मौसम में
प्रतीक्षित कोई कोंपल पर
ऊँची-नीची स्वरलहरियों के कोरस में
अपना कोई छंद कब
यह सब जाने कब
अभी तो बस
दौड़, प्रतीक्षा, संघर्ष
और गहरी, गहराती उदासी सब

Monday, May 16, 2011

कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं


पुस्तक प्रदर्शनी में
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं
न इन्हें कोई खरीदता है
न पढ़ता है
न समझता है
(देखने वाले भी होते हैं इक्के-दुक्के ही)
फिर
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है
कवि
इतना असंपृक्त क्यों होता है
न उसे कोई सराहता है
न दुलारता है
न समझता है
(जो समझते हैं, वो भी उपरी तहों में)
फिर
कवि कविताएँ क्यों लिखता है
कवि इतना स्वांत सुखाय कैसे होता है
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है

Sunday, May 15, 2011

दुनियादारी


संपूर्ण दिवस में एक क्षण
एक क्षण
जब अपना प्राकृत रूप पाता हूँ
तो देखता हूँ अपने मुखौटों को
जो नए और आकर्षक
ढ़ंग से सृजन किए हुए हैं
मेरी महत्वाकांक्षाएँ
देखता हूँ, ओढ़ रहा हूँ
सुबह की व्यस्तता का मुखौटा
स्वप्निल नींद से जाग जाने की झुँझलाहट
और दिन भर की
व्यस्तताओं की सूची
मेरे माथे की शिकन तक
लिखी हुई
आँखें उनींदी-सी
अभी भी रात के सपनों में
खोई-खोई
तभी याद आता है
आज का दिया हुआ हुआ
अपांइटमेंट
वही तोड़ता है मेरी काहिली
और बना देता है
मुझे मशीनी
थोड़ी देर बाद
जब बाहर कदम रखता हूँ
तो देखता हूँ
आईना
जमे हुए बालों से लेकर
जुराबों के रंग तक
सभी कुछ ठीक है
मगर
तभी आईने के अंदर से
कोई हँसता है
व्यंग्यपूर्वक
विद्रूप हँसी
मैं बलपूर्वक दबाता हूँ उसे
और चल देता हूँ
अभी थोड़ी देर बाद
किसी से मिलना जो है

Wednesday, May 11, 2011

एकदम से बदल जाता है मुकद्दर

हर बढ़ती हुई शै ही रवां होती है ,पूनम के बाद 
चाँद के साथ चाँदनी भी फ़ना होती है
तरक्की देखमा तो कुदरत की रवायत है,
 रोशन मशाल बुझते ही धुआं देती है

जो मेरा दोस्त था आज हमसफर है
,बदलते रिश्तों से ताज़गी बयां होती है

किसी पल एकदम से बदल जाता है मुकद्दर ,
इसके गहरे में मगर कायनात की रज़ा होती है



मेरा काव्य संग्रह

मेरा काव्य संग्रह
www.blogvani.com

Blog Archive

Text selection Lock by Hindi Blog Tips

about me

My photo
मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।