Monday, May 30, 2011

मार्क्सवाद की प्रथम प्रचारक


एक जगह
लेंपपोस्ट का मद्धम
आलोक था
आदमी से बड़ी
जहाँ से थी परछाइयाँ
एक अकेले शख्स को
वहाँ मैंने सिसकते पाया
पूछा नाम
तो वो बोला
करूण और दीन होकर
मैं
हैव्स नॉट/ सर्वहारा
एक जगह
थी कैंडल लाइट की सुरमई रोशनी
धीमे-धीमे संगीत में फ्लोर पर
एक शख्स को थिरकते पाया
आपका परिचय
मैं- वह धीमे से मुस्कुराया
मैं हैव्स/ बुर्जुआ
मैं उधेड़बुन में रहा
परेशानी में घिरा
चल पड़ा गम भुलाने
सागर से प्यार बुझाने
एक ही टेबल पर वहाँ
बैठे मैंने दोनों को पाया
तब मुझे बच्चन का
स्मरण सहज हो आया
मार्क्सवाद की प्रथम प्रचारक
मेरी प्यारी मधुशाला

No comments:

Post a Comment

मेरा काव्य संग्रह

मेरा काव्य संग्रह

Blog Archive

Text selection Lock by Hindi Blog Tips

about me

My photo
मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।