Monday, May 16, 2011

कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं


पुस्तक प्रदर्शनी में
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं
न इन्हें कोई खरीदता है
न पढ़ता है
न समझता है
(देखने वाले भी होते हैं इक्के-दुक्के ही)
फिर
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है
कवि
इतना असंपृक्त क्यों होता है
न उसे कोई सराहता है
न दुलारता है
न समझता है
(जो समझते हैं, वो भी उपरी तहों में)
फिर
कवि कविताएँ क्यों लिखता है
कवि इतना स्वांत सुखाय कैसे होता है
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।