Sunday, April 1, 2012

मालिक-मजदूर


रोज़
सुबह-सुबह
निकलते हैं घर से
मोबाइल कानों में लगाए
बैठते हैं गाड़ी में
दफ्तर जाते हैं
ढ़ेर सारे काम
करते-करवाते हैं
आते हैं देर शाम
थोड़ा टीवी देखकर
खर्राटे भरते हुए
सो जाते हैं
साहब हैं
मजदूर-सा जीवन बिताते हैं
छुट्टी के दिन
घूमते हैं घर के चारों गिर्द
धूल-मिट्टी, कचरा उठाते हैं
देते हैं पौधों को पानी
पानी की तेज बौछार से
गेट-गाड़ी धोते हैं
पसीना बहाते हैं
बन जाते हैं मजदूर
तभी हम घर के मालिक बन पाते हैं


Monday, February 27, 2012

टर्मिनेटर


कुम्हलाए फूलों ने कहा
हमें नहीं दुलराओगे
तीन दिन हो गए है, पानी कब पिलाओगे!
टपकते नल ने कहा
बातें करते हो जल संरक्षण की
मुझे कब सुधरवाओगे!
तीखे पत्थर के टुकड़े ने कहा
मुझ पर डालो रेती-मिट्टी
वरना चोटिल हो जाने के आरोप लगाओगे
टूटे गमलों, सूखी घास, छत के जालों
गंदे कपड़ो, रूखे जूतों, किताबों की गर्द ने भी
अपना-अपना हिस्सा माँगा
हमारी भी सुनो हमें कब सहलाओगे
सबको दिया उनका दाय
और भूल गया दिल की पुकार
जिसने की थी इल्तिज़ा
अल्लसुबह, आज इतवार है यार
फुर्सत के कुछ लम्हें मेरे साथ बिताओगे!

Tuesday, January 31, 2012

विंटर ब्लूज़


रोज़े-अब्र (बरसात के दिन) उदास रहती है
शबे-माहताब (चाँद की रात) उदास रहती है
खूबसूरत शै है वो मगर
जहीन बनकर उदास रहती है
सर्दियों में जाने क्या बात है
सरे-शाम उदास रहती है
गज़लें सुनती है लेटकर
लेटे-लेटे उदास रहती है
मुझसे करती है बेहद मुहब्बत
मुझसे मिलकर उदास रहती है
दुनिया में है मंदी, मोहल्ले में शोर
बस सुनती है और उदास रहती है
सच्चे मायनों में है इंसान
हर किसी के दुख में उदास रहती है


Monday, January 30, 2012

मुझे मुहब्बत है तुमसे...

कई बार रात-बिरात
नींद खुल जाती है
देर तलक कोशिश
करुँ सोने की,
नींद नहीं आती है
यक-ब-यक
रोशन हो जाता है
दिमाग़
घुप्प अँधेरे कमरे में
जैसे, रोशनी की एक
किरण आती है...
तनहाई और उनींदेपन में
एक कविता उतर आती है
रात गुलज़ार हो जाती है
.............................
यह अलहदा है कि
अक्सर सुबह वह
-   बहुत सोचने पर भी –
याद नहीं आती है
.......................
मैं आश्वस्त हो जाता हूँ
मुझे मुहब्बत है तुमसे
क्योंकि, अब भी उनींदी रातों में
कविता ही मुझ तक आती है...


Saturday, December 24, 2011

आश्चर्य है...!


माथे से
अंगूठे की पोर तक उमड़ती
जाती, ये लहरें...
सीने का वो उमड़ता तूफान,
खुशबू के दुर्निवार भँवर,
आँखों की अमाप गहराई
कोई शख्स कैसे
पूरा समंदर
हो जाता है

Sunday, October 9, 2011

हम जिसे छू सके, उसको ख़ुदा कहते हैं


कोई जरूरी तो नहीं, दरवेश की शक्ल बनाए
जिसकी तबीयत हो सूफ़ी, हम उसको खुदा कहते हैं

मेरे आगे कुछ और, मेरे पीछे अलहदा
मेरे बारे में पता नहीं, वो अस्ल में क्या कहते हैं

जब तलक तू है तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसको छू सके, उसको खुदा कहते हैं

मेरे माज़ी को लेकर या मुस्तकबिल की जानिब
कुछ भी कहें, वो हर बात बामज़ा कहते हैं

मैं तस्वीरों में सोचता हूँ, कहता हूँ लफ़्ज़ों में
कुछ लोग मगर खुद को काम से बाअदा कहते हैं

अजनबी इस दुनिया में, एक शख़्स तो अपना-सा है
इस अता से भी नीरव, सब लोग जुदा रहते हैं

Monday, August 22, 2011

फिक्रमंद-ए-दीन-ओ-दुनिया


रात को महताब दिन में आफताब रहती है
नाजुक है मगर गुस्से में गुलाब रहती है
फिक्रमंद रहती है दीन-ओ-दुनिया के लिए
खुद ही के लिए लाजवाब रहती है
अक्सर गुम रहती है अपने आप में भले
कहने पे आए तो रूह को बेनकाब करती है
जान लेती है हाल मेरा बिना कुछ पूछे
अपने हाल पर मगर हिजाब रखती है
हम अक्सर एक-दूसरे से सहमत नहीं होते
जाने कैसे वो मुझसे निबाह करती है

Wednesday, August 3, 2011

चाँद देखकर मचल जाती है


ख़लाओं से बाहर हो तो खिल जाती है
गुम न हो खुद में तो मिल जाती है
इतनी मासूम है कि फरिश्तों को मात दे
हर पूनम की रात चाँद देखकर मचल जाती है
कहने पे आए तो मचलती है झरनों सी
चुप हो जाए तो जैसे जुबां सिल जाती है
वो जिसके साथ हो, वो खुशनसीब जहां में
वो जिसके पास हो, जन्नत ही मिल जाती है
वो महबूबा हो, बहन, माँ हो, मौसी-बुआ
जिस रूप में किसी को हासिल मन्नत मिल जाती है

Sunday, July 31, 2011

जब-जब ऋतु वर्षा आती है....


जब-जब ऋतु वर्षा आती है
जूही हमारे घर के बाहर
श्वेत सुगंधित गलीचा बिछाती है
कोयल नामक बेल पर खिलते हैं
नयन-भावन नीले रंग के फूल
ढ़ेर सारे हरे पत्तों से लदे
दरख्तों के कारण सूर्य किरण नहीं आ पाती है
दिन भर रहते हैं हम सुरमई उजाले में
शाम और रात जल्द उतर आती है
गिलहरियाँ दौड़ती रहती है पेड़ों पर
पीली रंगीन तितलियाँ मँडराती हैं
नए-नए रंगों के खिलते हैं गुलाब
तुलसी भी बड़े दल उपजाती है
सागौन पर आ जाते हैं बौर
गुड़हल भी बौरा जाती है
भरे मन से करनी पड़ती हैं छँटाई
बोगनबेलिया इतनी फैल जाती है
गुलमोहर हो जाता है छतनार
अमलतास को धूप नहीं मिल पाती है
सुंदर चिड़ियों के नए जोड़े आ जाते हैं
जाने कहाँ से, गौरेय्या गाने गाती है
काई-सीलन-हरे पत्ते और अलबेले फूल
याद घने जंगल की आने लग जाती है
.............................................
ऐसे में जब भी छुट्टी आती है
कोई कहीं बुलाए देह देहलीज के पार नहीं जाती है

Sunday, July 17, 2011

गुलदस्तों की तरह मुझसे मिलने आते हैं लोग

इन दिनों खुशबू की तरह पेश आते हैं लोग

रगड़ लग जाए तो देर तक महकाते हैं लोग
वो दिन हवा हुए कि कोई पहचानता न था
अब तो बावजूद-हिज़ाब जान जाते हैं लोग
तेरे शहर की फिज़ाओं में ये क्या रंग तारी हुआ
अदब से रूकते हैं, दुआ सलाम फरमाते हैं लोग
कोई अफसाना नहीं हकीकत कर रहा हूँ बयाँ
मुझ पे नज़्मों गज़लों की तरह घिर आते है लोग
जब से जाना है तेरे प्यार में सँवर गया हूँ
गुलदस्तों की तरह मुझसे मिलने आते हैं लोग

Wednesday, June 29, 2011

रेत का घर है अपना


राह में लपटें बिछी हैं काग़ज़ी पाँव के नीचे
संभल कर चलें कितना आखिर तो है चलना
प्यार है समंदर से लहरों से बचना मगर लाज़मी
साहिल से दूर जाएँ कैसे रेत का घर है अपना
दौड़ते दिखते हैं मगर कहीं पहुँचते नहीं
ये वो लोग हैं दुबले होना है जिनका सपना
दोस्ती नहीं, मुहब्बत नहीं  कोई रंजिश भी नहीं
फख्र से कैसे कहें ये शहर है अपना
जहाँ कद नहीं वजन हो नाप आदमी का
तुम्हारा शौक तुम्हें मुबारक मुझको रास नहीं ये दुनिया

Tuesday, June 28, 2011

खरे सिक्के और क़ाग़ज़ी नोट


वो खरे थे
भारी थे
पोढ़े थे
सो पड़े रहे
ये काग़ज़ी थे
हल्के थे
अनुकूल थे
चलते रहे, चलते रहे
एक दिन
ये रद्दी हुए
और फिर फटे
गायब हो गए
हमने सोचा
अब वो आएँगें
देर से सही मगर
खरे सिक्के सराहे जाएँगें
मगर हाय
वो चले न चले
और पुराने की जगह
ये नए आ गए
नोट फिर सिक्कों पर छा गए
मगर दोस्त
गिला मत करना
ये मत समझना
सिक्कों की कोई
औकात नहीं
ये बाजार में चले ना चले
सहेजे जाएँगें
तुम न सही
तुम्हारे बच्चों
उनके बच्चों
और उनके बच्चों द्वारा
पूजे जाएँगें
नोटों का क्या है
वो तो आएँगें-जाएँगें
मगर हजारों साल बाद भी
जो इतिहास को
इस युग से
संस्कृति से
परिचित कराएँगें

Monday, June 27, 2011

कैसे भी हम मिलें


मिट्टी
स्वर्ण
मोमियाँ
लौह
काग़ज़ी
कैसा भी हो दीप
दीप की जंग एक-सी होती है
जग
जीवन
गली
डगर
घर
कहीं जले दीप
दुनिया में
उजाले की गंध एक-सी होती है
गीत
कविता
नज़्म
कथा-कहानी
कहीं चले
कलम
स्याही की
रोशनाई एक-सी होती है
तुमसे
उससे
उससे
सबसे
कहीं-किसी से
जले नेह का दीप
मन की उमंग एक-सी होती है
ख़त
खबर
संदेसा
मैं आऊँ
तुम्हें बुलाऊँ
कैसे भी हम मिले
मिलन की तरंग एक-सी होती है

Saturday, June 25, 2011

मेरे आप्त-वाक्य और आहें


जीवन की अनसुलझी पगडंडियों पर चलते-चलते
कभी-कभी भर जाता है मन
गहरे अवसाद से
छा जाता है यह अवसाद
दिलो-दिमाग पर
अमावस के तम की तरह...
मन में अजीब-सी रिक्तता, खालीपन और कुहरा
एक वितृष्णा-सी
सब कुछ अजनबी देश की तरह पराया-सा
किसी अनजानी देह की गंध-सा
सर्वत्र छितराया-सा लगता है
ऊब हो जाती है सबसे
अपनी किताबों से
डायरी से
फोटा अलबम
प्रेमिका के पत्रों औऱ निशानियों तक से
उन आँखों से भी
जो मैंने अपनी
राइटिंग डेस्क के सामने लगा रखी है
कहीं दूर जाने
भाग जाने को
मन करता है
बाहर निकलकर भी
चैन आता नहीं
चिड़ियों की चहचहाहट
यूँ लगती है ज्यूँ कानों में डाल दिया हो
सीसा पिघला हुआ
किसी परिचित की स्निग्ध मुस्कुराहट
शरीर बेधती-सी लगती है
सड़कों पर
दैनिक कार्यकलापों में व्यस्त भागती-दौड़ती जिंदगी
कीड़े-मकोड़ों सी मालूम होती है
हाय, हलो, अभिवादन
बेमानी, रस्मी, निहायत बचकाने मालूम होते हैं
मैं मुँह फेर लेता हूँ
यह जानते हुए भी कि
मैं यह ठीक नहीं कर रहा
तब बड़ी झल्लाहट होती है खुद पर
लगता है कल तक
मैंने जो कुछ जिया
नाटक था... ओढ़ा हुआ
आज मैं अपने प्राकृत रूप में हूँ
स्वाभाविकता के निकट
मगर सामाजिकता भी तो कोई चीज है
अंदर से एक आवाज आती है
चुप हो जाओ
मैं बेतहाशा चिल्ला उठता हूँ
चुप हो जाओ
मुझे सर्वत्र जंजीरों से जकड़ना ही अगर सामाजिकता है
तो मैं इसी क्षण
तीन शब्द कहने को तैयार हूँ
तलाक... तलाक... तलाक
न मैं खुलकर हँस सकता हूँ
न रो सकता हूँ
न गा-सीटी बजा सकता हूँ
क्योंकि ये तुम्हारी
शालीन संस्कृति के विरूद्ध है
संस्कृति... ऊँह... मेरे होंठों पर विद्रूप-सी
मुस्कान फैल जाती है
सड़ी-गली परंपराओं के
दलदल पर बिछा
मखमली कालीन...
इस कालीन पर पैर रखते ही
धँस जाता हूँ
गहरे बहुत गहरे
और तब
जबकि
डूब रहा होता हूँ
सोचता हूँ
अकेला ही क्यों मरूँ
बुला लूँ अपने दोस्तों को
नाते-रिश्तेदारों को
परिचितों को
अगली पीढ़ीयों को
इसलिए लिख देता हूँ
जीवन का अंतिम सत्य यही है
यही मोक्ष है
पुरुषार्थ है

Thursday, June 23, 2011

अबके सावन


जैसे किसान
एक लहलहाती फसल
काटने के बाद
आग लगा देता है
सारे खेत को
नष्ट हो सके
अनावश्यक ठूँठ
औऱ मिल सके
राख, खाद
मिल सके
नए बीज को
उर्वर जमीन
मेरी भूमि
परती नहीं
प्रतीक्षित है

Wednesday, June 22, 2011

यक्ष प्रश्न


क्या करने को था
क्या करता रहा
क्या करता जा रहा हूँ
कब तक
क्या करता रहूँगा
..............

Tuesday, June 21, 2011

एक और बरसाती नदी


लगने लगी फिर
टूटती-सी लय
जिंदगी की
उद्दाम लहरों के
फेनिल शोर ने
ढँक लिया
मधुरव
दीन-हीन अकिंचन-सा
बैठा रहा
सागरिक
हिचकोले लेने लगी
खूँटे से बँधी नैया
गहरे-गंभीर
और खामोश सागर में
आ मिली
एक और
बरसाती नदी

Thursday, June 9, 2011

बिना दिल के जीता हूँ


एक दिन मैंने सोचा
अपने दिल के सारे टुकड़े
ढूँढकर लाऊँगा
फिर से इन्हें जोड़कर
नया दिल बनाऊँगा
खोज से लौटा तो
एक टुकड़ा और कम था
देखा था मैंने
दिल के टुकड़ों पर
लोगों ने अपने
आशियाने खड़े कर लिए हैं
रास्ते में एक शख्स
निराश खड़ा था
उसके पास
नींव में डालने को
कुछ भी न था
मैं
आखिरी टुकड़ा भी उसे दे आया
और खुद बिना दिल के जीता हूँ

Tuesday, June 7, 2011

एक उलझन ही सही


एक उलझन ही सही मगर कुछ है तो सही
उनके पास तो सिवा खालीपन के कुछ नहीं
इतना यकीन था खुद पर और परस्तिश पे
इबादत को खड़े हुए तो खामोशी ही पढ़ते रहे
कभी अजान देता मैं और काश कि वो आते
खुदा न सही, उसकी खुदाई के दीदार तो हो जाते
हाय री किस्मत क बेरहमी को देखिए
वो आते हैं मेरे सामने हमेशा बुत बनके
कभी बुत भी बोलेगा क्या बता दीजिए
(समझ लो जुबा खामोशी की खुद ही यार)
बुत को बोलने की सजा तो न दीजिए

Saturday, June 4, 2011

खुद बिना दिल के जीता हूँ


एक दिन मैंने सोचा
अपने दिल के सारे टुकड़े
ढूँढकर लाऊँगा
फिर से इन्हें जोड़कर
नया दिल बनाऊँगा
खोज से लौटा तो
एक टुकड़ा और कम था
देखा था मैंने
दिल के टुकड़ों पर
लोगों ने अपने
आशियाने खड़े कर लिए हैं
रास्ते में एक शख्स
निराश खड़ा था
उसके पास
नींव में डालने को
कुछ भी न था
मैं
आखिरी टुकड़ा भी उसे दे आया
और खुद बिना दिल के जीता हूँ

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।