Tuesday, June 28, 2011

खरे सिक्के और क़ाग़ज़ी नोट


वो खरे थे
भारी थे
पोढ़े थे
सो पड़े रहे
ये काग़ज़ी थे
हल्के थे
अनुकूल थे
चलते रहे, चलते रहे
एक दिन
ये रद्दी हुए
और फिर फटे
गायब हो गए
हमने सोचा
अब वो आएँगें
देर से सही मगर
खरे सिक्के सराहे जाएँगें
मगर हाय
वो चले न चले
और पुराने की जगह
ये नए आ गए
नोट फिर सिक्कों पर छा गए
मगर दोस्त
गिला मत करना
ये मत समझना
सिक्कों की कोई
औकात नहीं
ये बाजार में चले ना चले
सहेजे जाएँगें
तुम न सही
तुम्हारे बच्चों
उनके बच्चों
और उनके बच्चों द्वारा
पूजे जाएँगें
नोटों का क्या है
वो तो आएँगें-जाएँगें
मगर हजारों साल बाद भी
जो इतिहास को
इस युग से
संस्कृति से
परिचित कराएँगें

1 comment:

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।