Sunday, October 9, 2011

हम जिसे छू सके, उसको ख़ुदा कहते हैं


कोई जरूरी तो नहीं, दरवेश की शक्ल बनाए
जिसकी तबीयत हो सूफ़ी, हम उसको खुदा कहते हैं

मेरे आगे कुछ और, मेरे पीछे अलहदा
मेरे बारे में पता नहीं, वो अस्ल में क्या कहते हैं

जब तलक तू है तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसको छू सके, उसको खुदा कहते हैं

मेरे माज़ी को लेकर या मुस्तकबिल की जानिब
कुछ भी कहें, वो हर बात बामज़ा कहते हैं

मैं तस्वीरों में सोचता हूँ, कहता हूँ लफ़्ज़ों में
कुछ लोग मगर खुद को काम से बाअदा कहते हैं

अजनबी इस दुनिया में, एक शख़्स तो अपना-सा है
इस अता से भी नीरव, सब लोग जुदा रहते हैं

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।