Monday, October 25, 2010

यूँ होता तो क्या बुरा होता!

देर तक साथ-साथ
जागते-पढ़ते-लिखते
उठते सुबह (!)
आठ साढ़े आठ, कभी नौ साढ़े नौ बजे
पीते चाय चुस्कियाँ लेकर
अखबार देखते
तुम बनाती चपाती सब्ज़ी
पराठे, अचार का नाश्ता करती
सद्य स्नाता निकलती
अपने बालों से
झरती बूँदें लिए
मैं थोड़ी-सी गार्डनिंग कर आता
या टिफिन भरने में तुम्हारा हाथ बँटाता
ठंडे पानी से नहाता
टाई कौन-सी पहनूँ
पूछता हुआ शर्ट के बटन लगाता
तुम्हें छोड़ता हुआ
तुम्हारे दफ्तर
मैं भी काम पर चला जाता
दो-चार पीरियड पढ़ाते न पढ़ाते
चार का वक्फ़ा हो जाता
तुम्हें लेता हुआ
घर आता
(बेशक, थोड़ी देर रास्ते में रूककर
 फल खरीदने की तुम्हारी आदत पर थोड़ा झुँझलाता
 मगर चुपचाप नीचे उतरकर तुम्हारे पास आ जाता)
शाम हसीन होती हमारी
दिन भर की बातों पर गप लगाते
तुम्हारे-मेरे साथ
काम करने वालों की मिमिक्री बनाते
चाय-कॉफी थोड़ा ठंडा-गर्म हो जाता
फिर दूर तक निकलते
हम इवनिंग वॉक पर
लाते खरीदकर
नर्सरी से मौसमी फूल
फल के पौधे
कुछ जमीन पर
बाकी ग़मलों में
तुम्हारे हाथ से उन्हें लगवाता
शाम की एक सब्जी मैं बनाता
सलाद तुमसे कटवाता
तीसरी रोटी खाते-न-खाते
तुम्हें बुलाता
तुम्हारे लिए थोड़ी टेढ़ी ही सही
गरम रोटी मैं बनाता
डिनर करते हुए देखते
टीवी में खबरें
बहस दुनिया भर की
कहानी घर-घर की
कभी फिल्म कभी गेम-शो
कभी म्यूज़िक, डांस का प्रोग्राम कभी
रिमोट हमेशा
तुम्हें पकड़ाता
रविवार...
होता सचमुच छुट्टी का दिन
पूरी छुट्टी तुम्हें लेकर मैं मनाता
लाँग ड्राइव पर निकलते कभी हम
कभी फिल्म का कार्यक्रम बनाते
घूमते देर तलक मॉल में
फिर किसी अच्छी-सी
होटल में डिनर कराता (कैंडल लाइट होती, बड़ा मज़ा आता)
लौटते देर रातों में हम घर को
जूही चमेली की सुगंध से
तब तक लॉन महक जाता
तुम लगाती गज़लें पुरानी या क्लासिकल
मैं इंस्ट्रूमेंटल
अपनी गोद में तुम्हें लेटाया
मैं गुनगुनाता (अक्सर होता इसका उल्टा भी,
 तुम्हारी गुनगुनाहट पर मैं कान लगाता)
...................................
जीवन फूल-सा होता
महकता-गमकता-खिलता
बस चुटकियों में निकल जाता
मगर यूँ हो ना सका
मैं तुम्हारे
तुम मेरे इंतजार में
देर-देर तक
करते है काम अलग-अलग
जाते हैं अलग-अलग जगह
अलग-अलग समय
सुबह का नाश्ता
दिन का खाना
अलग-अलग करते हैं
जैसे लिख दिया है इंतजार
और विरह
स्थायी भाव की तरह
किसी ने नसीब में
लम्हा-लम्हा, कतरा-कतरा हम जीते हैं
साथ-साथ हैं
मगर कहाँ साथ-साथ रहते हैं?
कहाँ एक दूसरे के साथ जीते हैं?
(यूँ कहना भी क्या ग़लत है कि दूरियों में
तिल-तिलकर हम थोड़ा-थोड़ा रोज मरते हैं)

Saturday, October 23, 2010

मैं चैन से रह नहीं सकता

कोई आग़ोश में लेता है

मुझमें जादू-सा जगाता है
मैं आदमी बन बैठा फक़त
मुझे फिर इंसाँ बनाता है
एक शिखर पर पहुँचते ही
तलहटी की राह दिखाता है
मैं चैन से रह नहीं सकता
हरदम याद दिलाता है
मेरी गिरह में हैं कारूँ
मुझे कर्ण बनाता है
राम का कद उतना ही
रावण बढ़ता जाता है
दुनिया अजीब गोरखधंधा
मन उचटा जाता है



Thursday, October 21, 2010

मुद्दत हुई

गुजारे नहीं लम्हें अपने साथ
देर तक जागकर
लिखी नहीं नज़म
बिना दूध की
तुर्श चाय नहीं पी नींबू डालके
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं दिन
तुम्हें याद करके
कुछ सोकर
कुछ खाकर
फिर सोकर
सपनों से सपनीले दिन
सरदर्द होने तक सोए रहने के
खाली कम खर्चीले दिन
मुद्दत हुई
गुजारे नहीं
बस अपने होने को
सहने-सहते रहने वाले दिन
...................................
मुद्दत हुई
तुम अकेला छोड़कर कहीं नहीं गई
सुनो! क्या अब सचमुच कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी?

Wednesday, October 20, 2010

transformation

कुछ कविताएँ

मेरे अंदर
कहानियाँ बन जाती हैं
कुछ कहानियाँ
कविता बनकर
मुझमें घर कर जाती है
कुछ कविताएँ
चोला चढ़ाकर
मूर्तियाँ बन जाती हैं
कुछ कहानियाँ
झटक कर अपना सारा स्थूल
महज सुगंध
बन जाती हैं

Tuesday, October 19, 2010

धूप क्वांर-कार्तिक की

धूप झिलमिलाती है
नए पैटर्न बनाती है
छा जाती है छत पे
पापड़-बड़ियाँ सुखाती है
रोशनदानों से छनकर
कोनों को महकाती है
खुली खिड़कियों में समा
दरवाजे को मुँह चिढ़ाती है
मेरी कलम पर उतर
कविता लिखवाती है
आ जाओ घर-जल्दी-
साँझ हुई जाती है
धूप क्वांर-कार्तिक की
मुझे तुझ-सा बनाती है

Sunday, October 17, 2010

नीलकंठ

जब
दुःख पीकर
और खुशी बाँटकर
जिए,
तो गहरा कहा
जाएगा तुझे





Saturday, October 16, 2010

हम सारे कोलाज

एक खंड यहाँ से,
एक वहाँ से उठा,
टुकड़ों के इस सु(!)मेल से,
रचा गया है, मुझे, तुम्हें...
हम सबको...
हर कण की, हर खंड की...
ठहरी अलग प्रकृति अपनी
कोई संस्कृति, सभ्य पुरुष-सा,
कोई नराधम, अनाचारी,
कोई अजब, अमित स्वरूप-सा
कोई विकृत अविनासी
इन सबको जोड़ा गया
है, एक सूत्र में,
मैं भी इसी तरह
तुम भी इसी तरह
हम सारे कोलाज...
(कोलाज – उपयोगी, अनुपयोगी वस्तुओं को जोड़कर बनाई गई नई आकृति)
इसीलिए तो हममें
कुछ है मोम-सा नर्म...
कुछ है पाषाण-सा कठोर...
कुछ मधु-सा मीठा और
कुछ तमस का कटुकर...
इन सबके कॉकटेल से,
मैं भी बना हूँ,
तुम भी बने हो,
हम सारे कोलाज....।

Thursday, October 14, 2010

केवल कविता नहीं

कैसे उसको कविता कह दूँ केवल जो मेरी अविकल आहों का
जो मेरी अधूरी तृष्णाओं का लुटा हुआ खजाना है,
कैसे उसको कविता कह दूँ?
जिनसे छिपी मेरी पीड़ा है,
जिनमें छिपा मेरा मरघट-गान
जो मेरी यादों का,
महका हुआ वीराना है
कैसे उसको कविता कह दूँ?
जहाँ मैंने प्राण लुटाए,
जहाँ मैंने पाया जीवन,
जिनसे मेरे जीवन का
उलझा ताना-बाना है,
कैसे कहूँ कविता?
नहीं, नहीं यह कविता नहीं,
मेरे जीवन की सत्य कहानी है,
गीले नयनों से गा-गाकर
मुझे ही जिसे सुनानी है।

Tuesday, October 12, 2010

क्यों

क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों? जीवन की राहों में,
है कितने कंटक और प्रस्तर-खंड,
घिसट-घिसट अपनी देह को,
अनजानी मंजिल पर लिए जा रहा हूँ क्यों?
क्यों जिए जा रहा हूँ – क्यों?
मैं अंतर्मन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित ओढे,
जीवन के इस रंगमंच पर, निरंतर
अभिनय किए जा रहा हूँ – क्यों?
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं क्यों?
महत्वाकांक्षा को सहेजे,
दिवास्वप्नों को समेटे,
हृदय और आँखों में,
आशाएँ सजा रहा हूँ क्यों?
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं क्यों?

Sunday, October 10, 2010

जब तुम नहीं होती हो

बहुत खामोश है फ़िज़ा, बड़ी उदास शाम है
यादें हैं, और खोई-सी आँखें हैं
गोकि तुम नहीं हो शहर में।
खाली दीवार से टकराकर,
आँखें खोजती है जाने क्या,
फिर ले आती है, एलबम-सा कुछ,
तस्वीरें अनवरत बोलती जाती है,
कुछ या दिखलाती है,
दर्द जगाती है,
बेचैनी बढ़ाती है,
तुम्हारी याद दिलाती है, ये भी कि
तुम नहीं हो शहर में।
आलम-ए-तनहाई है,
गहराती रात है,
धुँधला-सा चाँद है
फीकी-फीकी तारों की बारात है।
जज़्ब दिल के सारे जज़्बात है
क्योंकि तुम नहीं हो शहर में।
कितनी बेजार है, महफिलें,
बेमानी है हँसी, और माहौल,
बदरंग है सारे हँसी मंजर,
सब कुछ बदल गया है जब बदले
दिल के हालात हैं।
तुम नहीं हो शहर में
जा रहा हूँ मैं कहाँ,
ये कौन-सा मकाम है।
ये राहें हैं कौन-सी, कौन-से ये मोड़ हैं,
अजनबी सब लोग हैं,
अजनबी है रास्ते
कौन-सी गलियाँ है, कौन से मकान है
अजनबी ये शहर है, जब
तुम नहीं हो शहर में।
ना रंग है, ना राग है
ना महफिलें, ना ख्वाब है
ना गज़ल है ना नज़्म
कभी कोई टूटा-सा शेर,
आता है यक-ब-यक,
गम-ए-शायर के बदले
हालात हैं,
तुम नहीं हो शहर में।

Friday, October 8, 2010

तुम्हारे लिए




तुम्हारे लिए – अपने आसपास
इतनी इकट्ठी
कर ली थी
उदासी
कि
जब खुशी का मौसम आया
तो
हँसने
के लिए
मेरे पास
नहीं बची थीं
एक कतरा
हँसी भी।

Wednesday, October 6, 2010

आस्तिक

सीने के बजाय सिर से लगाया
तुम्हारी किताब को –!
यार, तुम न हुए
खुदा हो गए !

Tuesday, October 5, 2010

मेले में...

मुक्त अकेलापन –

और मैं।

क्या सचमुच अकेलापन

मुक्त होता है?

नहीं, वह

निर्युक्त है

आबद्ध है

एक अकुलाहट भरी

प्रतीक्षा में।

Monday, October 4, 2010

नियति

दर्द हर बार मिला
और ताउम्र साथ रहा,
खुशी हरदम मिली,
मगर साथ रही पल-छिन

Sunday, October 3, 2010

अज़ीब

दूर रहता हूँ तो
यकीं-सा रहता है
रह सकता हूँ दूर भी
मिलने पर क्यों ऐसा लगता है अक्सर
कि रोज-रोज क्यों
न मिलता रहा....


Wednesday, September 15, 2010

पीली तितलियाँ


अब भी दिख जाती है
तितलियाँ
रंग-बिरंगी,
कलात्मक पंखों और
टेक्सचर वाली
मगर,
कहाँ गईं वे
सादे पीले रंगवाली
आदिम तितलियाँ
जो झुंड-का-झुंड
बैठी रहती थी
चुपचाप
पुवाड़ियों की हरी झाड़ियों की
कतारों में
पीले फूलों के बीच
उन्हीं-की-सी होकर
और पास जाते ही
उड़ जाती थीं
निःशब्द, नीरव, अनायास
सपनों की यादों-सी
..................................
जैसे उड़ गया है
मॉल की आकर्षक महँगी डिश के बीच से
पंजी-दस्सी में स्कूल के बाहर मिलने वाले
समोसे और चटनी वाली पपड़ी का स्वाद
.......................................
मुझे पीली तितलियाँ और
खस्ता पपड़ियाँ
अब ज्यादा याद आती है

Friday, September 10, 2010

खंडकाव्य(!)

तुम बिन मेरी शाम
बहुत शांत होती है, बहुत ख़ामोश...
कहीं कोई हलचल नहीं,
कोई जुम्बिश नहीं,
मगर मैं, सिर्फ मैं जानता हूँ
कि यह शांति नहीं सन्नाटा है...
तूफान के आने के पहले की
शांति-सा...।
मौन, निस्तब्ध यामिनी
यह अच्छी तरह समझती है,
कि हर तूफान के पहले
ऐसी ही शांति होती,
मरघट की शांति...
ज्यों-ज्यों शाम गहराती है,
मन की परतें खुलती जाती है
अनवरत... धीरे-धीरे...
प्याज़ के छिलकों की तरह...
चेतन पर हावी होता
जाता है अवचेतन
विवेकानंद पर हावी
होता है फ्रायड...
गोर्की पर कामू...
टॉलस्टाय पर युंग...
प्रेमचंद पर सार्त्र
मैं सोचता हूँ-
मेरा पतन हो रहा है,
मगर तभी कानों में
गूँजता है गीतासार
और आँखों में उभरता है,
कृष्ण का साँवला-सलोना,
चंचल चेहरा,
जो उद्घोषणा करता है
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मैं अलसा जाता हूँ
तभी आते हैं विवेकानंद
और कहते हैं
‘उतिष्ठ जागृत प्राप्य वरान्निबोधत्’
मगर जागने के लिए
सोना जरूरी है
सोने जाता हूँ, तो
रॉबर्ट फ्रॉस्ट कहता है
सोने से पहले कोसों चलना है...
मैं चल पड़ता हूँ
अनंत, अनवरत, अथक,
महायात्रा पर...
ठीक किसी अलसाए भौंरे की तरह
किसी थकी मंद समीर की तरह,
मगर कोई भी यात्रा
नहीं पहुँचाती किसी मंजिल तक,
मगर फिर भी मैं रोज
स्वीकारता हूँ,
अंतहीन सफर की
इस नियति को,
क्योंकि मुझे लगता है,
कोई और भी है – जो चल रहा है-
अंतहीन सफर में, यायावर की तरह
ठीक उससे पहले, जबकि नींद अपने
आग़ोश में मुझे देती है
चंद घंटों की मौत...
मैं सोचता हूँ
कि जीत जाते हैं अंतत:
दकियानूसी संस्कार...
परंपराएँ, रूढ़ियाँ...
फ्रायड, कामू, सार्त्र
हार जाते हैं,
जीत जाते हैं
टैगोर, गाँधी
प्रेमचंद...।


अनुवाद


ओ अदृश्य! मैं कर रहा अनुवाद
तुम्हारे जिए हुए जीवन को, पलों को, अनुभूतियों को...
देखो,
जीवित हो उठे फिर से एक बार वो क्षण
मगर
इस बार अपनी भाषा में, नहीं
मेरी भावनाओं में, जो अवर्ण हैं...
क्योंकि उन क्षणों को
भोगा हूँ मैंने आज
जो महसूस गए थे उन दिनों, तुम्हारे द्वारा
ओ अनाहत! मैं तो पुकार रहा हूँ
महज इसलिए;
कि तुमने भी मेरी तरह ही
देखा होगा ये सब,
तो ओ हम निगाह (एक दृष्टि)
आओ एक रूह (एकात्मा)
हो जाए। अस्पृश्य, आज तक, मगर अब
मैं तुममे, तुम मुझमें
और हम दोनों
डूबती हुई इस शाम में
खो जाएँ, खो जाएँ...

Wednesday, September 8, 2010

तुम

तुम मेरे जीवन में सबसे
ऊँची, गहरी, सबसे
भारी!
नहीं यह तेरेपन की जीत,
न ही यह मेरेपन की हार
सब कुछ लगता पूर्व नियोजित
बनना है जिसका हमको
अधिकारी।
कभी करके जिनको या
दिन जाया करते थे बीत
आज वे कोसों मुझसे दूर
लिया तुमने सबसे मुझको जीत।
बँटा था मैं कितने टुकड़ों में हाय
तुमने लिया मुझे सहेज
दिया व्यक्तित्व नया औ’ प्रीत
स्वीकारो इसे मेरे ओ’ मीत।

Monday, September 6, 2010

डायरी




तुम मेरी डायरी हो,
डायरी बिना क्या मैं!
तुम मेरी लायब्रेरी हो,
लायब्रेरी बिना क्या मैं!
तुम मेरा सृजन हो,
सृजन बिना क्या मैं!
तुम मेरा चिंतन हो,
चिंतन बिना क्या मैं!
तुम मेरी कल्पना हो,
कल्पना बिना क्या मैं!
तुम मेरा वजूद हो,
वजूद बिना क्या मैं!
तुम मेरी ‘तुम’ हो,
तुम्हारे बिना क्या मैं!

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।