Friday, November 20, 2009

रिचार्जिंग




बारिश के पानी को
छत के परनाले में
एक पाइप लगाकर
छोड़ दिया एक टंकी में
धारदार-तुलतुल-बूंदबूंद
जिस तरह से आए
हो जाए इकट्ठा....
काश ! मैं भर सकूं
खुद को भी इस तरह
.............
मगर आसमान से मेरी छत पर
इन दिनों बरसती है
उदासी झमाझम
कर लूँ संचित !
ढेर चाहे कचरे का हो
मूल्यवान हो जाता है एक दिन
देखा-सुना है
मेरी उदासी भी अर्थवान हो उठेगी
इकट्ठी हो कर......!

Thursday, November 19, 2009

इन्दौर




चक्रवात !
जिसमें होती है
एक केन्द्रित शक्ति
जो घूर्नित होती रहती है
निरन्तर ,ले जाती है किनारे से
अंदर क्रमश और अंदर
पत्तों, फूलों और तितलियों को
सान देती हैं उन्हें
धूल के गुबार की एक अवर्नित वेदना से..
.....................
दूर से देखो तो चक्रवात
कितना खूबसूरत दिखाई देता है
किसी गुब्बारे या फूल के गुच्छे-सा
...............................
कभी आओ इन्दौर तो
चक्रवात की अंदरुनी असलियत देखो

Wednesday, November 18, 2009

रंगत सांवली-सी


जिन लोगों से मिलकर हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही शख़्सियत हमें चाहिए
जिन जगहों पर जाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही जगह हमें चाहिए
जिन गीतों को गाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही जिंदगी हमें चाहिए
जिन रंगों को देखकर हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही रंगत हमें चाहिए
जिन पर मिट जाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि उनका बने रहना ही हमें चाहिए


हिंदी दिवस (!)













विचार

किसी भाषा के
गुलाम नहीं
लेकिन
अपनी भाषा में
सब कुछ
कहना भी आसान नहीं
अपनी भाषा में गाओ, गुनगुनाओ मगर
दूसरी जबान को भी
समझो, सराहो
दिल बड़ा हो तो
तमाम अनुभूतियाँ
दामन थाम लेती है
क्योंकि
सारी नदियाँ
समंदर में विराम लेती है....



Sunday, November 15, 2009

शरद ऋतु






सर्द रात के बाद गुनगुनी सुबह आबाद है
मैं हूँ ,याद है,मौसम औ मन पे शवाब है

आँख है कि खुल के भी मुंदी जाती है
एक हसीन चेहरे का अभी भी ताज़ा ख़्वाब है

वो सामने है पर दिखाई नहीं देता
ज़ुल्फें भी कमबख़्त बन गई हिज़ाब हैं

Saturday, November 14, 2009

पचमढ़ी




लंबे समय के बहाव से
काटे गए गहरे, उथले, ऊँचे-नीचे रास्तों के बीच
रेत, गोल पत्थरों और
हरियाली के छोटे-छोटे टापूओं को चारों ओर से घेरकर
कल-कल बहता रहता है
झरनों से गिरने के बाद
समतल में पानी...
.....


कैसे अपने बहने / होने / बहते रहने को
किसी भव्य चौखट में जड़ी
कलात्मक तस्वीर की तरह
मढ़ देता है हमारे अंदर
मुझे अक्सर होती है हैरानी...।

Friday, November 13, 2009

इन दिनों




सूरज
आग बरसाता है
पारा
चढ़ता जाता है
ऊपर और ऊपर....
लेकिन
मुझे लगता है
दूर कहीं
बारिश हुई है
सौंधी महक आती है
तू
दूर जाती है
और तेरी
ज्यादा याद आती है....

Thursday, November 12, 2009

चलो,बबूल ही सही,मगर....


काँटें,काँटें,काँटें ही नहीं
बारिश के बाद
बबूल पर भी आते हैं फूल पीले
..........
दो थोड़ी-सी नमी तो
पत्थर पर भी
जम जाती है काई हरी
...........
थोड़ा कुरेदो ,भटको तो
रेगिस्तान में भी
खिला मिलता है नखलिस्तान
...............
सहला भर दो
तो दर्द दवा बन जाता है
बदरंग रोंआं रंगीन
बन जाता है
......
मैं भी मुतमइन हूँ
कोई मुझे भी दे
बारिश,नमी,भटकन,सहलन....
इन्सान बना दे

Wednesday, November 11, 2009

ये आँसू-2




इसलिए नहीं कि
तुमसे दूर हो गया हूँ
इसलिए नहीं कि
बरसों-बरस साथ रहने से
आदत हो गई है
इसलिए नहीं कि
तुम वहाँ कैसे,क्या करोगी
जैसे प्रश्न मुझे मथते हैं
इसलिए तो कतई नहीं कि
अब मुझे अपने काम ख़ुद करने होंगे
इसलिए भी नहीं कि
हड़बड़ी के वक्त
चाबी,पर्स,रुमाल,कंघा और मोज़े
ढ़ूढ़ कर कौन देगा
इसलिए नहीं कि
उठेगा
जब बांहो में तूफान
तो जिस्म एक पास नहीं होगा
इसलिए नहीं कि
नींद में मेरा हाथ
उठकर किस पर गिरेगा
इसलिए नहीं कि
मेरे कमीज के बटन कौन टांकेगा
कौन मेरे कपड़े धोएगा
मेरी चिड़चिड़ाहट,मेरा गुस्सा
कौन शांति से सहेगा
इसलिए नहीं कि
बगीचे में होने वाले
छोटे-छोटे परिवर्तन किसे दिखाऊंगा
ग़ुलाब,गुलदाऊदी,गुड़हल या
गुलमोहर का पहला फूल
तेज़ हवा,गहरे बादल,झमाझम बारिश
हरियाते खेत,चारों ओर भरा पानी
अब किसे दिखाऊंगा
रात के खाने के बाद
ज़बरदस्ती,अपने साथ,
अब किसे घुमाऊंगा
(खुद भी शायद ही जाऊंगा )

बल्कि इसलिए कि
.................
...मैं ..तुम्हें..
तुमसे...मैं..
............
कह नहीं पाऊंगा

Tuesday, November 10, 2009

तीस्ता-2


तीस्ता, ओ तीस्ता, ओ तीस्ता
तू संग चले
ओ तीस्ता

मैं चलूँ जिधर
मैं जाना चाहूँ कहीं
तू रोकती मेरा रास्ता
क्या चाहे तू
ज़रा ये तो बता
तीस्ता ,ओ तीस्ता,ओ तीस्ता........

Monday, November 9, 2009

कामायनी

बाहर झंझा ,आँधी,,बिजली,

उनचास पवन, सौ तूफान आएं
मजाल कि हमारे-तुम्हारे
कभी दरमियान आएं
जैसे डूबती नहीं बल्कि
ऊपर और ऊपर उठकर
तैरती रहती है नाव
चाहे झील में कितना ही
पानी,कितने झरने,कितनी ही
धरधराती धाराएँ आएं....



Sunday, November 8, 2009

किस्मत



अपनी तारीख़ में
तारीक के सिवा
कुछ भी नहीं
आपकी तारीफ़ में
तारीख़ के सिवा
कुछ भी नहीं


Saturday, November 7, 2009

मूरत



तू जनता का नहीं

अजन्ता का कवि है
कहता है एक दोस्त
सुनो
समझो कुछ
कितना सही कहता है
अनजाने वो बेचारा

Friday, November 6, 2009

सम्यक्



जो अन्ततःसमुद्र में मिलती है
जिसे हम समझ बैठते हैं
झील या डबरा

हरेक जिन्दगी एक सम्पूर्ण पेय है
जिसे हम समझ बैठते हैं
पानी खारा


वस्तुतः जीवन एक औपन्यासिक कृति है
जिसे हम समझ बैठते हैं
लघुकथा


सबका जीवन एक परंपरा है
जिसे हम समझ बैठते हैं
क्षणव्यथा


अच्छा हो अगर हम पहचान लें
अपने जीवन की
प्रवाहितता, सम्पूर्णता,
औपन्यासिकता और परंपरा
वरना एक सूने, रवहीन, रेगिस्तान में
परिवर्तित हुआ जा रहा है
जीवन हमारा.......




Thursday, November 5, 2009

ख़ज़ाना





तनहाई
हो किसी को काटती
किसी के लिए ख़ला
ख़ाली किसी के लिए
............................
मेरे लिए तो ख़ज़ाना है
क्योकि इन्ही लम्हों में तो
तुम्हारा आना-जाना है
...............


Wednesday, November 4, 2009

आय'म पोयम लवर




कविता
सबसे पहले पढ़ता हूँ मैं

कविता पढ़ना
अच्छा लगता है मुझे
किताबों ,कापियों,पत्रों.पत्रिकाओं
.अख़बारों या दीवारों पे
जहाँ कहीं भी लिखी हो
कविता
पढ़ता हूँ मैं
एक साथ कवि और दुनिया को
समझने का सबसे सरल और
सरस रास्ता
–कविता-
समझता हूँ मैं
सुबह-दोपहर-शाम-रात
सोते-जागते-खाते-पीते
जब भी मिले मौका
-कविता पढ़ने का-
मौका नहीं चूकता हूँ मैं

Sunday, November 1, 2009

कोई आखिरी नेपथ्य नहीं होता




प्रकाश-वृत्त में और पर्दे
के आगे खड़ा नहीं
रहना होता हमेशा...
अपनी भूमिका निभाने के बाद
छोड़ना ही होता है
मंच
जाना ही होता है
नेपथ्य में, पर्दे के पीछे
अभिनेता बड़ा हो या छोटा
.............
मगर जिन्दगी नाटक नहीं
यहाँ कोई नेपथ्य नहीं होता
पर्दे के पीछे पर्दे
नेपथ्य के पीछे नेपथ्य
-यही क्रम आगे भी-
बदलते हैं केवल रोल
और यह तो हर कोई है जानता
-बहुरूपियों के लिए
नेपथ्य का कोई
अर्थ नहीं होता-






तीस्ता रे.....!




ओ नदी के धारे !
मैं कब आऊंगा पास तुम्हारे ?

मैंने देखा है एक सपना
मैं रह रहा हूं
एक ऐसी जगह
जहाँ बहती है
तूफानी नदी
मेरे घर के द्वारे.....


Saturday, October 31, 2009

तुम दूर हो


सोचा था वह कुछ और था
क्य़ोकि दूर रहकर
लिखता-लिखाता नहीं
चिढ़ता-चिढ़चिढ़ाता था......






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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।