इसलिए नहीं कि
तुमसे दूर हो गया हूँ
इसलिए नहीं कि
बरसों-बरस साथ रहने से
आदत हो गई है
इसलिए नहीं कि
तुम वहाँ कैसे,क्या करोगी
जैसे प्रश्न मुझे मथते हैं
इसलिए तो कतई नहीं कि
अब मुझे अपने काम ख़ुद करने होंगे
इसलिए भी नहीं कि
हड़बड़ी के वक्त
चाबी,पर्स,रुमाल,कंघा और मोज़े
ढ़ूढ़ कर कौन देगा
इसलिए नहीं कि
उठेगा
जब बांहो में तूफान
तो जिस्म एक पास नहीं होगा
इसलिए नहीं कि
नींद में मेरा हाथ
उठकर किस पर गिरेगा
इसलिए नहीं कि
मेरे कमीज के बटन कौन टांकेगा
कौन मेरे कपड़े धोएगा
मेरी चिड़चिड़ाहट,मेरा गुस्सा
कौन शांति से सहेगा
इसलिए नहीं कि
बगीचे में होने वाले
छोटे-छोटे परिवर्तन किसे दिखाऊंगा
ग़ुलाब,गुलदाऊदी,गुड़हल या
गुलमोहर का पहला फूल
तेज़ हवा,गहरे बादल,झमाझम बारिश
हरियाते खेत,चारों ओर भरा पानी
अब किसे दिखाऊंगा
रात के खाने के बाद
ज़बरदस्ती,अपने साथ,
अब किसे घुमाऊंगा
(खुद भी शायद ही जाऊंगा )
बल्कि इसलिए कि
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...मैं ..तुम्हें..
तुमसे...मैं..
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कह नहीं पाऊंगा