Monday, April 13, 2015

इस साल लंबा खिंचा बसंत है

इस साल लंबा खिंचा बसंत है
झरते रहे 
पीले पत्ते झर-झर
फूटती रही 
कोंपले रंगारंग
कोयल कूकती रही
शाखों पर
तितलियाँ
मंडराती रही फूलों पर
ठंडी-गर्म हवाएं
चली सुबहो शाम
पड़ा दो- एक बार
तेज़ पानी भी
आती रही सौंधी-सौंधी गंध है
इस साल लंबा खिंचा बसंत है
टेसू फूल रहा लाल-लाल
खुला-खुला दिन
दोपहर में चेहरा हो रहा लाल
शाम तक आते -आते
मीठी-सी हो जाएं हवाएं
शब मालवा की
मानो सुगंध है
इस साल लंबा खिंचा बसंत है
कभी धूप कभी बारिश
दोनों तेज -तेजतर
वर्चस्व की लड़ाई हो
और हो रही भिड़ंत है
इस साल लंबा खिंचा बसंत है

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।