Sunday, September 5, 2010

एकाकी पीड़ा


अकेलेपन की छाया में मेरी पीड़ा एकाकी
अपने से ही बात करूँ,
अपने सुख-दुख का हाल कहूँ,
अपने घावों को खुद देखूँ।
अपनी पीड़ा गाऊँ
अकेलेपन की छाया में मन
मेरी पीड़ा एकाकी
सत्य के क्षितिज तक पहुँचकर
अंतिम सत्य शून्य ही पाता,
कह नहीं ‘सच अंतिम’, क्यों
बार-बार मैं दोहराता
अकेलेपन की छाया में मन
मेरी पीड़ा एकाकी।एकाकी है तन-मन
मंजिल मेरी एकाकी,
बस दो पल साथ मिला;
बाकी जीवन एकाकी।
अकेलेपन की छाया में, मन
मेरी पीड़ा एकाकी!!
कितनी दूरी तय कर ली,
कितना त्रास भोग चुका,
नहीं मील का पत्थर पथ में,
जो बतलाए- कितना चलना है बाकी।
अकेलेपन की छाया में, मन
मेरी पीड़ा एकाकी।।

1 comment:

  1. संवेदनशील रचना।

    हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

    हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।